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Monday, August 28, 2017

अच्छे दिन हैं भाई कहने दो

जनतंत्र है सब स्वतंत्र हैं
अच्छे दिन हैं भाई कहने दो
नोट जो रखे थे माँ ने कनस्तर में
हुए काले से गुलाबी रहने दो
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
सब्जी बेच रही जो माई
उसके घर में नहीं पकती रोटी ढाई
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
फसल बहा ले गया  मानसून फिर
और झूल गया  एक गजेंदर फिर
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
जी एस टी, सी एस टी ढो रही जनता
हो गया बाज़ार सस्ता कह रहे नेता
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
व्यापारी को मिलता नहीं नोट
रूपये का गिर गया मोल
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
डूब रहा पटना दरभंगा
जल रहा रोहतक हरियाणा
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो

लड़ रहा खाली पेट जवान
भूखा मर गया किसान
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो

कल तक थी बेटियाँ कंधो पर भारी 
अब आई है नन्हे मासूमों  की बारी  
बांचते पोथी पत्री  शिक्षाविद कहते 
नहीं है सिर्फ ज़िम्मेदारी हमारी 

आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो

कमीटियाँ बन गईं  ढेर सारी  
मर गई कब की आँख की शर्म सारी  
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
मनीषा

Friday, June 16, 2017

तिथियाँ रह जाती हैं

सिर्फ तिथियाँ  रह जाती हैं
लोग चले जाते हैं
लम्हे गुम  हो जाते हैं
कुछ अनकही बाते रह जाती हैं

दिन निकलता है ढलता है
चेहरे बदल जाते हैं
समय चक्र सा चलता है
सिर्फ व्यवहार बदल जाते हैं

गम ओ 'खुशियाँ  वही रहती हैं
मुकाम बदल जाते हैं
कहानियाँ  किस्से वही  रहते हैं
बस किरदार बदल जाते हैं

दुनियावी संसार चलता है
कर्ता, कारक बदल जाते हैं
कर्मो का खाता  चलता है
सिर्फ कर्ज़दार  बदल जाते हैं
मनीषा 

Wednesday, March 15, 2017

ये कैसे रहनुमा हैं

ये कैसे रहनुमा हैं जो सच से डर जाते हैं
धर्म समझ कर नासमझ बच्चों को आँख दिखाते हैं
कैसे ये पैगम्बर हैं कौन से हैं ये खुदा
जो मासूम मुस्कुराहटों पर फतवे लगाते हैं
कांच से भी नाज़ुक हैं ये कौन से संस्कार
जो प्यार मोहब्बत से चटक जाते हैं
कोई निकला है तीर -ओ- तलवार तो कोई ख़ंजर ले कर
ये किसके धर्म हैं जिन्हें ये चन्द ठेकेदार बचाते हैं
मनीषा

Tuesday, March 14, 2017

ना खेलूँ श्याम तो संग होरी रे

ना खेलूँ श्याम तो संग होरी रे
भरी गागर फोरी काहे मोरी रे, रसिया
नंद बाबा के लाल भए दोउ
इक बलराम दूजे सांवल मुरारी रे, रसिया
ग्वाल बाल संग मोहे रंग दिखावे
श्याम काहे डगर मोरी घेरी रे, रसिया
बरसाने जाइ के रास रचाना
श्याम हमहुँ ना राधे तोरी रे, रसिया
रंग अबीर टेसू मोहे भावे
भर भर गागर भिजोए बनवारी रे, रसिया
ना खेलूँ श्याम तो संग होरी रे
भरी गागर फोरी काहे मोरी रे, रसिया
मनीषा
मार्च 2017

Wednesday, March 8, 2017

निज-स्वप्न की उड़ान

तुम उड़ना
निज-स्वप्न की उड़ान
बिटिया तुम उड़ना
हो पथ पर आदित्य आक्रांत
या छाए अम्बुद घनेरे हों
भय त्याग निर्भीक तुम बढ़ना
तुम उड़ना बिटिया
निज-स्वप्न की उड़ान
राह बांधे मन कभी रोकें पग भूलभुलावे सभी
हो कंटक की चुभन कहीं
अविचिलित अविरल तुम बढ़ना
तुम उड़ना बिटिया
निज-स्वप्न की उड़ान
पंख कभी भारी हों मंद हो गति कभी
लेना तुम पल को विश्राम कहीं
फिर स्मित मुस्कान लिए तुम बढ़ना
तुम उड़ना बिटिया
निज-स्वप्न की उड़ान

पंख बाँध ले जाए व्याध कभी
मिले ना तुम्हे नभ विस्तृत विशाल कभी
खोना मत निज पर विश्वास कभी
तुम उङना बिटिया
नित परवान नई
तुम उड़ना 
निज-स्वप्न की उड़ान 
छोड़ जाएं चाहे पथ पर मनमीत सभी
राह हो जाए भूलभुलैया सी कभी
मत भूलना निर्मल संस्कार
बिटिया तुम उड़ना
निज-स्वप्न की उड़ान
सरिता सा निर्मल पथ हो
पुष्प रंजित तुम्हारी डगर हो
पितृ आशीष का श्रृंगार लिए
तुम बढ़ना बिटिया
तुम उड़ना
निज-स्वप्न की उड़ान

ललचाए तुम्हे जो विकृत पथ की सरल माया 
विचारो जो पथ पर क्या खोया पाया 
निज हृदय में ढूंढ लेना तुम मेरा तुम पर विश्वास 
और कर जाना हर बाधा पार 
तुम उड़ना बिटिया
निज-स्वप्न की उड़ान 
मनीषा
8 /3 /2017