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Friday, November 24, 2017

पिता

पिता की आँखो में अश्रु
माँ के नैनो में मनुहार देखा है
बस इस इक रिश्ते
में बिना शर्त  प्यार देखा है

Wednesday, November 8, 2017

रिश्ते कुछ अजीब होते हैं

रिश्ते कुछ अजीब होते हैं
जहां है वहाँ  कभी नहीं मिलते
और कभी अचानक यूँही मिल जाते हैं
ये रिश्ते भी अजीब  होते हैं

कभी कुछ दूर के होते हैं
तो कभी नज़दीकियों के
कभी अनुभवी से होते हैं
कभी नादान  से होते  हैं
ये रिश्ते भी अजीब  होते हैं

जन्मो से गहरे पल में जुड़ जाते हैं
कभी तार तर हो क्षण में टूट जाते हैं
कुछ बिखरे से होते हैं
कुछ गहरे से होते है
ये रिश्ते भी अजीब  होते हैं

बेतक्क्लुफ़ से बेपरवाह से होते हैं
तो कभी मजबूरी में निभाह  होते हैं
मुस्कुराते हैं एकांत में
चुभ जाते हैं महफिलों में
ये रिश्ते भी अजीब  होते हैं

कुछ मीठे से कुछ तीखे से
अपने से, अजनबी से
शरारती से, गंभीर से
कड़वे से, खट्ट मीठे से
चटपटे लच्छेदार होते हैं
ये रिश्ते भी अजीब  होते हैं

मन पे बंधे बंदनवार से
हथेली पे रची मेहँदी से
सावन के त्यौहार से
जीवन की खरी कमाई होते है
ये रिश्ते भी अजीब  होते हैं
मनीषा वर्मा



Saturday, October 14, 2017

हिंदी तो बिंदी है

हिंदी तो बिंदी है भारत माँ के भाल की
बोली इसकी खड़ी है लिपि देवनागरी
संस्कृत की बेटी है उर्दू की भगिनी है
भाषाओँ में भागीरथी है हिंदी
सूर की बोली खुसरों की पहेली
कबीर की वाणी रसखान का काव्य है हिंदी
तुलसी की मानस में कामायनी के व्याख्यान में
विचारों की अविरल धारा है हिंदी
क्रिया विशेषण वाच्य कारक
संधि समास अलंकारों से सुसज्जित
साहित्य की दुल्हन सी है हिंदी
हिंदी की गाथा है गाथा भरत संतान की 
मनीषा वर्मा

Monday, August 28, 2017

अच्छे दिन हैं भाई कहने दो

जनतंत्र है सब स्वतंत्र हैं
अच्छे दिन हैं भाई कहने दो
नोट जो रखे थे माँ ने कनस्तर में
हुए काले से गुलाबी रहने दो
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
सब्जी बेच रही जो माई
उसके घर में नहीं पकती रोटी ढाई
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
फसल बहा ले गया  मानसून फिर
और झूल गया  एक गजेंदर फिर
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
जी एस टी, सी एस टी ढो रही जनता
हो गया बाज़ार सस्ता कह रहे नेता
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
व्यापारी को मिलता नहीं नोट
रूपये का गिर गया मोल
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
डूब रहा पटना दरभंगा
जल रहा रोहतक हरियाणा
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो

लड़ रहा खाली पेट जवान
भूखा मर गया किसान
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो

कल तक थी बेटियाँ कंधो पर भारी 
अब आई है नन्हे मासूमों  की बारी  
बांचते पोथी पत्री  शिक्षाविद कहते 
नहीं है सिर्फ ज़िम्मेदारी हमारी 

आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो

कमीटियाँ बन गईं  ढेर सारी  
मर गई कब की आँख की शर्म सारी  
आ गए अच्छे दिन भाई कहने दो
मनीषा

Friday, June 16, 2017

तिथियाँ रह जाती हैं

सिर्फ तिथियाँ  रह जाती हैं
लोग चले जाते हैं
लम्हे गुम  हो जाते हैं
कुछ अनकही बाते रह जाती हैं

दिन निकलता है ढलता है
चेहरे बदल जाते हैं
समय चक्र सा चलता है
सिर्फ व्यवहार बदल जाते हैं

गम ओ 'खुशियाँ  वही रहती हैं
मुकाम बदल जाते हैं
कहानियाँ  किस्से वही  रहते हैं
बस किरदार बदल जाते हैं

दुनियावी संसार चलता है
कर्ता, कारक बदल जाते हैं
कर्मो का खाता  चलता है
सिर्फ कर्ज़दार  बदल जाते हैं
मनीषा