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Saturday, December 3, 2011

मैं और तुम



आँखों में तुम्हारी  भी तो हँसी उतर आती होगी 
जब याद की कोई लड़ी दिल से गुज़र जाती होगी
फिर खुद को समेट कर चुपके से तुम भी 
कोरो पे ठहरा वो  अश्क छुपाती तो होगी
कभी पुरानी सी वो ग़ज़ल जब कानो में पड जाती होगी
दिल की कली खुद ही खिल जाती होगी
लब पे एक आह आती तो होगी 
और मेरी तस्वीर तुम्हारी  आँखों में उतर जाती तो होगी 
हर एक  शख्स में मेरी छवि सी नज़र आती होगी
फिर नज़र चुरा के सबसे तुम आगे भी बढ़ जाती होगी 
कितना भी निभा लो तुम दुनिया की इन रस्मो को 
जानता है दिल हर मन्नत में मेरे लिए एक दुआ आती तो होगी

Wednesday, November 30, 2011

रिश्ते


ज़िन्दगी की आपाधापी में कुछ रिश्ते जो हाथ से छूट जाते हैं
तन्हाइयों में अक्सर याद आते हैं
मन करता है कभी उन्हें पुकार ले, धीरे से फिर वो नाम लें
फोन की तरफ बढ़ता हाथ थम सा जाता है
भीतर बैठा कोई टोकता  है "ये कोई वक़त है?"
"अभी नही फिर कभी"
"शायद कल "
और वो कल फिर नहीं आता और उम्र बीत जाती है
उस एक अधूरी बात में
 उस याद में , एक चाह में 
की कभी उन्हें पुकार लें
कभी तो धीरे से उनका नाम लें

Saturday, November 19, 2011

एक दिन जब हम साथ होंगे



एक दिन जब हम साथ होंगे 
एक पास होंगे 
तब शायद प्यार के ढंग बदल जायेंगे
कहने के अंदाज़ बदल जायेंगे
साथ साथ होगा तब 
हमें  हर एहसास
देखेंगे हम तब एक साथ
बारिश की बूंदों से नाम होती हरी घास
और सुनेंगे साथ-साथ 
पत्तों से ढुलकती शबनम की आवाज़
गंध भरेगी माटी
हमारे भीतर साथ-साथ 
और साथ ही भीग जाएँगे
हम किसी तेज़ फुहार में
कभी बहुत सवेरे 
आँगन बुहार मैं
जब भीतर आऊंगी 
तब पाऊंगी तुमने फिर
घर बिखरा दिया है
या गीला फर्श मिट्टी से भर दिया है
मैं झुन्झुलाऊंगी  और चिल्लाऊंगी भी तुम पर
तुम तब शायद हंस दोगे 
और एक घूँट में चाय ख़तम कर
चल दोगे अपने काम पर
मन में एक गुदगुदाता एहसास लिए
कभी किसी छुट्टी के दिन रसोई में खड़े हो कर
तुम , मुझसे कुछ बनवाओगे
और फिर
मेरी ही नुक्ताचीनी भी करोगे
यूंही कभी-कभी सताओगे मुझे तुम
मुझ रूठी हुई को मनाओगे भी तुम
कभी जब दस्तक सुन मैं किवाड़ खोलूँगी'
तब हवा के भीने झोंके से तुम मिलोगे
दरवाज़े के उस पार
कितनी ही शरारते होंगी
रोज़ कितनी ही बातें होंगी
घर की दफ्तर की
अनुभवों की
नित  नई- नई नोक झोंक होगी
कभी शायद जब हम साथ होंगे 
एक पास होंगे

Friday, November 18, 2011

प्रसंग


कहते हो की हमारे बीच का प्रसंग यूँ ही चलने दो
लेकिन सूनी रात , भीगी पगडंडियों पर 
घिसट घिसट चलने और रुकने की कोशिश में
जब कदम सहम जाते हैं
एक चुप्पी आवाज़
मेरे भीतर से फिसल 
पहुँच जाती है कहीं दूर
सुन पाती हूँ - प्रतिध्वनि मात्र
एहसास तब करती हूँ 
कितना फर्क है चलते रहने और रुक जाने में
तुम्हारे वे अंदाज़ जो मेरी समझ से बाहर हैं
पहेली से बन गए हैं
उन्हें बूझ ना पाने की लाचारी में
एहसास करती हूँ
कितना फर्क है समझ लेने में और ना समझ पाने में
जब मेरी ही अधरों से कहला कर और 
मुझे मेरी ही बातों में उलझा कर तुम हंस देते हो 
तब एहसास करती हूँ
कितना फर्क है कह देने और चुप रह जाने में
कभी अनचाही यादों के पुलिंदे 
छांटती हूँ और कोई बहका सा ख़याल 
मुझे बेचैन कर देता है 
तब एहसास करती हूँ. कितना फर्क है 
याद रखने और भूल जाने में

Thursday, November 17, 2011

कुछ अलफ़ाज़...

तुझे खबर क्या  तेरी रातों  के  लिए  कैसे सितारे चुन  दिए  मैंने , 
दे  कर  तुझे  स्नेहल  चाँद  निष्ठुर  सूरज  रख  लिए  मैंने 

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तेरे प्यार का ये एक भरोसा ही काफी है मेरे जीने के लिए 
तेरी ज़िन्दगी में न सही तेरी हर मन्नत में शामिल हूँ मैं ज़रूर

Thursday, November 10, 2011

सूरज


माना मैं  ढलता सूरज हूँ 
 डूब कर भी तेरे चाँद को रौशन कर जाऊंगा 
बस इतना सा ही नहीं है मेरा फसाना 
इन अंधेरों के पार फिर मुझे इक सुबह को रौशन करना है 

Tuesday, November 8, 2011

कैसे खबर हो मुझे

जो मैंने कहा वो ज़माने ने तो सुन लिया
 तुमने वो सुना या ना सुना कैसे खबर हो मुझे
जो मैं गा रहा हूँ. ज़माना दोहरा रहा है
तुमने भी कभी गुनगुनाया ये कैसे खबर हो मुझे 
मेरी खबर तो तुम तक पहुँचती होगी ज़रूर
तुम्हे मेरी खबर  हो जाती है
ये कैसे खबर हो मुझे 

Saturday, November 5, 2011

कृष्णमय


मैं उसकी हुई इस जीवन मे जो मेरा हो कर भी मेरा नही है
मन मेरा मीरा भी राधा भी
कृष्ण सबके हो के भी ना मीरामय मे ना राधामय

Wednesday, November 2, 2011

उजले अन्धेरे



तू पूछता है की तेरी ज़िंदगी मे है ये अंधेरा कैसा
बता इन अंधेरो से है तुझे डर कैसा
इनमे चमकते है सैकड़ो सितारे
तू खोजता है सूरज कैसा
माना तेरी राहो मे है बहुत रोड़े
है जिगर तुझमे तो बना ले
उन्हे मील का पत्थर


Sunday, October 2, 2011

राम की लीला



वो राम की लीला, कहाँ खो गयी
वो दरियाँ बिछाना, वो सेट सजाना
वो दिन दिन भर डायलाग के रट्टे लगाना
वो मुहल्ले के अंकल का हनुमान बनना
और बच्चो का वानर सेना बन जाना
वो सीता की वाटिका कहाँ खो गयी
वो राम की लीला कहाँ खो गयी
वो चंदों की घोषणा वो इनामों की उद्घोषणा
वो दुर्गा जी की आरती, वो  गदा घुमाना, वो तीर चलाना
वो दशरथ की मौत पर पूरी सभा का शोकाकुल हो जाना
वो मैदान के उस पार तक हनुमान की उड़ान कहाँ खो गयी
वो रावण के ठहाके वो जटायु का बलिदान
वो नानी का राम सीता की जोडी पर न्योछावर दे आशीष लेना
वो रात रात भर मूँगफली खाना, सहेलियो के लिए दरी पे जगह बचाना
वो मास्टरजी के हारमोनियम पर बजती रामलीला की चौपाईयाँ कहाँ खो गयी
सब लोग कह्ते है तरक्की हो गई
इस दिल्ली के मोहल्लों से पर वो राम की लीला कहाँ खो गयी

Wednesday, September 28, 2011

पतझड़


फिर बीता मौसम बहारों का
फिर पतझड़ आ गया है
फिर टूटेंगे कुछ  दिल
के फिर नज़रों मे प्यार छा गया है

फिर बीता मौसम बहारों का
फिर पतझड़ आ गया है
फिर टूटेंगे कुछ  दिल
के फ़िर नज़रों मे प्यार छा गया है

सूरज मे बहुत नर्मी है
हवा भी अब कुछ बर्फ़ीली है
करीब से गुज़रते हुए
फिर कोई नज़रें चुरा  गया है

बहुत वीरनियाँ है इन पहाड़ों मे
बहुत खामोशियाँ है इन तूफ़ानों मे
इस साल सर्द रातों मे काँपेंगे हाथ
फिर कोई जाते हुए आग बुझा गया है

Monday, September 26, 2011

मंज़िले





उड़ानो की हद मत तय करो अभी आसमान और भी हैं
नाकामी को दिल से इतना मत लगाओ, अभी रास्तो मे मंज़िले और भी हैं
पाने को मंज़िल रास्तों के पैर मोड़ दे ओ! मीत
बन वो राहगीर जिनकी शिद्द्त मे मंज़िले राह खोजती हैं

Thursday, September 22, 2011

अतीत

कभी आ जाती है यूँ ही आवाज़
अतीत के कोने से
मन फ़िर से बहकने लगता है
पर तब ज़िन्दगी पुकार उठती है
और हम जीने लगते हैं
एक बार फ़िर
अजनबी से
बिना उस धडकन के

Tuesday, September 13, 2011

कल्कि

काया थी कमज़ोर तो क्या
बुलन्द थी तेरी आवाज़
सच्चा था तेरा आह्वान
दृढ़ था तेरा निश्चय
कूचे कूचे से फ़िर उठी थी
गूँज वही " मैं भी अन्ना "
"मैं भी अन्ना"
हिल उठे फ़िर सिंहासन
के मतवाले
चमक उठी बूढी आँखो मे
वही आशा पुरानी थी
त्रस्त है सदी
भूख और मजदूरी
से टूट रही थी देह
हर भारतवासी की
भ्रष्टाचार का असुर
कर रहा अट्टाह्स है
हर तरफ़ बेकारी है
लाचारी है
त्राही त्राही कर रही भारत माँ
लाल उसके सोए थे
ऐसे मे आए हो तुम
ले ज्योति परिवर्तन की
कलयुग के कल्कि बन
उतरे हो अवतार मय
हाँ, तुम ही मेरे अन्ना
तुम ही मेरे अन्ना
तुमने फ़िर मन मे विश्वास की
मशाल जगाई है
बदलेगा भारत फ़िर अपनी किस्मत
हर बेटे को फ़िर ये आस दिलाई है
आज तुमको इस भारती का
शत शत नमन
शत शत वन्दन

Tuesday, September 6, 2011

फर्क

चाहती हूँ हमारे बीच का प्रसंग
यूँ ही चलता रहे.....
लेकिन
सूनी रात के सन्नाटे में 
अनजान राह पर 
अजीब उमंग से बढ़ते हुए 
क़दमों को 
न चाहकर भी, करती हूँ जब
रोकने का प्रयतन
सहम जाती हूँ तब
एक चुप्पी आवाज़ 
मेरे भीतर से फिसलकर 
पहुँच जाती हे कहीं दूर
सुन पाती हूँ 
केवल प्रतिध्वनि मात्र 
एहसास तब करती हूँ
कितना फर्क हे-
चलते रहने और रुक जाने में......

तुम्हारे वे अंदाज 
जो मेरी समझ से बाहर हे 
पहेली बन गए हे
उन्हें बूझ न पाने की लाचारी में 
एहसास करती हूँ 
कितना फर्क हे
समझ लेने 
और ना समझ पाने में.....

जब मेरे अधरों से कहलाकर
मेरी ही बातों में मुझे उलझाकर
तुम हँस देते हो
तब एहसास करती हूँ
कितना फर्क हे
कह देने
और चुप रह जाने में.....

कभी स्मृति के दर्पण पर
झलक आता हे 
किसी अनचाही याद का अक्स
और कोई बहका सा ख्याल
खींच ले जाता हे मुझे
अतीत के भँवर में 
एहसास करती हूँ तब में
कितना फर्क हे
याद रखने
और भूल जाने में........

Sunday, July 10, 2011

शाम

साज़िशे थीं वक्त की
दुहाइयाँ कुछ ज़माने की
के मिल ना पाए हम तुम
और ज़िन्दगी की शाम हो गई

Saturday, July 9, 2011

उदासी

अब यह कोहरा छ्टने दो
और उजाला बिखरने दो
मन मे गहन उदासी है
थोड़ी हँसी बिखरने दो

कितनी प्यास है यहाँ
स्वाति की एक बूँद ढलने दो
इन कोरी चादरो पर
कुछ सिलवटे सिमटने दो

तन्हा सी शाम हो गई है ज़िन्दगी
थोड़ी लालिमा घुलने दो
बहुत कुछ गुम गया है बीते पलो मे
यादों का कारवाँ फ़िर गुज़रने दो

Thursday, July 7, 2011

कुछ पंक्तियाँ

घर-आँगन  छूटा, गाँव छूटा, देश छूटा 
ये कैसी प्रीत मितवा ये कैसी प्रीत
उजले देश की उजली रीत
बंधी है पलकों में  फिर भी 
इस देस की पीर 


ज़िंदगी ने बदल ली हैं कई परते फिर भी
नाम तुम्हारा पन्नो पर उतर ही आता है
रोक लेते है कलम अकेले मे भी
कभी नाम इबादत का भी रुसवा हो ही जाता है


मुझसे मेरे ख्वाब उसी ने चुराए
खेल था जिसके लिए मेरी इबादत

जिन्हे समझा था अपना वो हो गये पराए
गैरों ने दी है सदा इस दिल को पनाहे मुहब्बत


तेरे इशक में हुआ है मेरी मदहोशी का आलम ये
की खबर नहीं की तुझे चाहती हूँ या सिर्फ तेरे ख्याल को




Sunday, July 3, 2011

तेरे उजाले


रात की चादर मे फ़ैले सितारे समेट लिये
मैने तेरे अन्धेरो के लिये उजाले चुन लिए

हवा ने आ कर कहा था कि तू उदास है
तेरे लिए मैने कई वसंत बुन लिए
मैने तेरे अन्धेरो के लिये उजाले चुन लिए

सावन ने बरस कर बताया कि तन्हा बैठी है तू
मैने तेरे लिए सप्त सुर गूंध लिए
मैने तेरे अन्धेरो के लिये उजाले चुन लिए

तू आ और मेरी ज़िन्दगी मे शामिल हो ज़रा
मैने तेरे लिए प्यार के सागर भर लिए
मैने तेरे अन्धेरो के लिये उजाले चुन लिए

3 ज़ुलाई 2011

Friday, July 1, 2011

माँ



इन पुराने कपड़ों से अब भी तुम्हारी महक आती है
माँ आज मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है
घर छूटा, दर छूटा तुम्हारी साँस छूटी हर आस टूटी
उस उदास आँगन मे बसी तुम्हारी आवाज़ आज भी बुलाती है
माँ आज मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है
मेरे बचपन के हिंडोले, वो खेल खिलौने
तुम्हारा गुस्से मे मुझे धौल धर देना
वो प्यारी याद अब भी मेरी पीठ सहलाती है
माँ आज मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है
बहुत लड़ती थी तुम्हारी एक बात नही सुनती थी
फिर भी तुम्हारी हामी पर तन मन से पुलकती थी
तुम्हारी स्नेह भरी नज़र अब भी मुझे हौसला देती  है
मेरी हर कथनी करनी पर तुम्हारी सहमति जड़ देती है
माँ आज मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है
जग के किस कोने मे तलाशूँ मैं तुझे
कहाँ से मिले फिर वो फटकार मुझे
कैसे मिले तेरे आँचल की छाँह मुझे
हम माँ बेटी मे झलक कभी तुम्हारी दिख जाती है
उसकी तुतली बातें मुझे तुम्हारे संग अपनी याद दिलाती हैं
माँ आज मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है
मनीषा 

Wednesday, June 29, 2011

साया

कोई नही है पास मेरे
बस एक साया ही तो है यहाँ
कही से अब तो आवाज़ दो
मुझे तुम बहुत सन्नाटा है यहाँ
जब तक नही जानती थी
तुम्हारे संग क्या होगी ज़िंदगी मेरी
बहुत आसान थी कटनी हर तन्हा शाम
चल कर संग तुम्हारे दो कदम ही अब
कटती नही है सूनी ये दो घड़ियाँ भी
कही से अब तो आवाज़ दो
मुझे तुम बहुत सन्नाटा है यहाँ

मनीषा

Sunday, June 26, 2011

क्या लिखूं तुम्हे जो छू जाए

क्या लिखूं तुम्हे जो छू जाए
काश ! की प्यार मेरा इस लेखनी मे उतर जाए
धड़कनो की स्याही मे डुबो कर कलम
सोचती हुँ कि क्या लिखूँ जो रंग मेरा इन पन्नो पर उतर जाए
दबा के अधरो को रखती हूँ अक्षरों को
कोरे काग़ज़ पर और जानती भी भी हुँ
की बेईमान ये ना जाने क्या तुम्हे कह जाएँ

अपने शब्दो मे पाती हूँ, झलक
हरी घास पर, छितरे पीले फूलों की
और सोचती हूँ आज कही वही याद पन्नो पर उतर पाए
क्या लिखूं जो तुम्हे छू जाए
काश! की प्यार मेरा, लेखनी मे उतर पाए

वक्त की रेत पर फ़िसलते पाँव

वक्त की रेत पर फ़िसलते पाँव,
ज़मीन तलाशते जल रहे हैं
शायद ये जलन नियती हो

या फ़िर कोई संकेत
कि इस रेत की ढलान पर ही
कहीं मिलेगी ठडी छाँव भी
उस असीम प्रेम की
और भर देगी मेरे जीवन मे भी
तृप्ति की शीतलता

तुम आ कर इसी सफ़र में
उठा लोगे इन कदमों को
अपनी मृदु हथेलियों पर
और कर लोगे मुझे
अपने आप मे समाहित्॥
written on 26-04-1999

Friday, June 24, 2011

मचा है घर मे एक हंगामा

साँसे रुकी हुई, नज़र बेचैन सी
दिल थाम के बैठे है कि
तेरे आने की खबर से
मचा है घर मे एक हंगामा सा॥
अम्मा की आवाज़ से आँगन गूँज रहा है
भाभी की खीर से घर महक रहा है
छोटी बदल रही है सब कवर
पापा ने ली है फ़िर अखबार के पीछे शरण
ये तेरे आने की खबर से
मचा है घर मे एक हंगामा सा॥
धुला पुछा सा आँगन
मानो चह्क उठा है
आज बाहर लगा अमलतास भी
खिल उठा है
हर आह्ट पर अम्मा के हाथ रुक से जाते है
कदम उनके दरवाज़े की ओर बढ़ ही जाते हैं
ये तेरे आने की खबर से
मचा है घर मे एक हंगामा सा॥

घड़ी कि सुईयाँ आज रुक सी गई हैं
रोज़ दो पल मे गुज़र जाने वाली सुबह
आज थम सी गई है
भैया आज ले छुट्टी तुम्हे लिवाने गए है
आज शहर भर के इक्के गुम से गए है
हर टाप पर मेरी आस धक सी गई है
ये तेरे आने की खबर से
मचा है दिल मे मेरे एक हंगामा सा॥

Sunday, June 19, 2011

प्यार

ये दिलों के रिश्ते हैं सदियो तक इनके साए साथ चलते है ,
जन्मो का रिश्ता लम्हो मे नही बिखरा करता,
मिल जाती है अपने ही हाल से तेरी खबर,
मौसम के साथ दिल नही बदला करता।

पदाधिकारी

तुम्हारे ऊँचे पद
बड़े बड़े नाम लिखे डायरियों मे
किस काम मेरे
जो दिला न सके
एक मज़बूत छत
एक चारदीवारी
और एक नौकरी
उसे, जिसे कहते थे
तुम भाभी
नई दुल्हिन
और अब एक बेसहारा अबला
जो जूझ रही है जीवन के समर मे आज
तन्हा, निपट अकेली
अंगुली उठाना आसान है
सरल है व्यवहार की कमी मे झांकना
जब आँचर हो किसी दूसरे का
ये तुम्हारे पदों के लेबल
किस काम उसके जो पोछ ना पाए
आँसू और भर ना पाए मन उसका

Saturday, June 11, 2011

सब के बीच का अकेलापन

सब के बीच का अकेलापन
सालता है
जैसे दरखत कोई नग्न खड़ा हो
खुले आस्मां के नीचे
दूर तक बस वीरानगी है
सूरज भी डर के डूब गया हो जैसे
चकोर चुप है इतना सन्नाटा है
आसमां भूल आया हो अपने सितारे जैसे
आज अकेली खड़ी हूँ
त्रिशंकु की त्रासदी भाँपती मै
इक कमज़ोर सी होती डोर
पर पत्ते सी झूलती मै

Friday, June 10, 2011

मियाँ हुसैन

जिन्होने किसी लकीर को नही माना, ना समाज की रवायतो को जाना
बहुत कम होते है ऐसे यायावर जो अपनी ही शर्तो पर जीते है

ताज़ा खबर

सबसे पहले और सबसे आगे ये सिर्फ़ कागज़ के गुलाम
वही दिखाते है जो बिकता है
दर्द हो या आँसू
खून हो या पसीना
मय्यत का मौसम हो या
शादी का महीना
बस दिखाते है ये ताज़ा खबर
कल आन्दोलन का अवलोकन था
आज बहस है मय्यत की
बस जो बिकता है ये वही बताते है
सिर्फ़ ताज़ा खबर ही दर्शाते है

Tuesday, June 7, 2011

मंथन

मंथन है जनगण का
विष मिला है
अमृत की प्रतिक्षा है्।

Monday, June 6, 2011

सत्ता के गलियारो मे आवाज़ एक सच की गूँजी थी

सत्ता के गलियारो मे
आवाज़ एक सच की गूँजी थी
हर भारतवासी के मन मे
फ़िर से आशा जागी थी
कालाबाज़ारी के खिलाफ़
हर गली मे खिलाफ़त उठी थी
घोटालो मे डूबे हर नेता को
सबक सिखाने की सूझी थी
साथ अन्ना के फ़िर से सच्चाई का परचम लहराने
एक बार फ़िर जनमत ने ठानी थी
हा! धिक्कार तुम्हे जो आज़ाद भारत के नेता हो
अपने मुद्दो मे उलझा कर
तुमने सोती जनता पर अन्धियारे मे वार किया
दिन मे तो आँख ना मिला सके
रात में अत्याचार किया
सच की लड़ाई को पह्चान न सके
कभी बाबा कभी सिब्ब्ल कभी माया बन
अनाचार किया
फ़िर ये परचम लहराएगा
आज तुम्हारा है
कल जनता का भी दिन आएगा
जिन हाथों ने आज तुम्हे सिंहासन है दिया
उन्ही हाथों मे चक्र सुदर्शन भी लहराएगा
आज मूक खड़ी जो तमाशा देख रही है
वो जनता हारी है न समझना
ये भी न समझना कि
जनता सिर्फ़ भोली भाली है
मूल मुद्दे को भुला नही देगी ये
उस दिन बता देगी ये ,जिस दिन जनमत आएगा




Tuesday, May 31, 2011

प्रयास

कुमार विश्वास जी कि हर रचना कुछ ऐसे छू जाती है मन को कि अपने आप ही शब्द मन से फ़ूट पड़ते है। उन्हे तो शायद इल्म भी नही होगा कि उनकी रचना किसी को फ़िर से कलम उठाने की प्रेरणा दे जाती है…

रिवायते कुछ दुनिया की कुछ फ़र्ज़ की मजबूरियाँ है
कैसे चलूँ तेरी ताल पर मेरे पैरो के नीचे धरती बिछी है
तू कवि है तेरे तरन्नुम मे सपनो की फ़ुलवारियाँ खिलती है
मेरे नसीब के आसमां को सितारे भी नसीब नही है
तू नाप आसमां की ऊंचाईयों को मेरे दिल को अब चलने की आदत नही है

Sunday, May 29, 2011

इतनी दूरियाँ है बीच मे


इतनी दूरियाँ है बीच मे
के मेरी कल्पना भी नही जाती
किसे कहूँ कैसे दूँ यह संदेस
की वहाँ मेरी धड़कन भी नही जाती
न खत ही आया कोई ना आया कोई पैगाम
यह किस जहाँ मे पहुचे हो तुम कि
मेरी आवाज़ भी तुम तक नही जाती
स्वपन सा सुंदर संसार दिखा कर
मेरे अंतर मे मोती बसा कर
क्यो छोड़ गये मुझे दिखा स्वप्न संसार
अब मेरी अश्रु धार भी
तुम्हारी अँगुलिया पोंछ नही पाती

Tuesday, May 24, 2011

ख्याल तेरा यादो मे

ख्याल तेरा यादो मे आता है ऐसे
बिसरी गज़ल कोई दोहराता हो जैसे

लबो से तेरा नाम लेते है ऐसे
बाद मुद्द्त के चखी हो सुरा जैसे

बहुत चाह्त है विसाल-ए-यार कि हमे
मुद्द्त हो गई किसी दर पे सज़दा किए हुए

ऐ खुदा मेरी आहो को ज़रा असर बख्श दे
वो भी करे उफ़्फ़ ज़रा जिनकी तड़प मे हमने उम्र गुज़ार दी

Tuesday, May 17, 2011

सब चलता है!!!

जी रहे है आस मे ईश्वर की चाह मे
कुछ नही बदलता है ये हिन्दुस्तान है यहाँ सब चलता है
नेता है गुंडे, पालते हैं सिर्फ़ चमचे
क्या करे चुनाव जीत आना है
कुर्सी बड़ी चीज़ है, नोट खर्च मे ही जीत है
जनता है बेवकूफ़ भोली होने का बहाना है
क्या करे कुछ ऐसा ही ज़माना है
कुछ नही बदलता है ये हिन्दुस्तान है यहाँ सब चलता है

जगह जगह चक्का जाम है दुहाई है ये कैसा विकास है
मँहगाई पर रोक नही है, कत्ल पर टोक नही है
बोने वाले के घर अन्न नही है, मर भी जाए तो गम नही है
जन्मदात्री के जन्म पर मौत खड़ी है
एक मुठ्ठी अनाज पे दुलारी बेटी बिकी है
इस अन्धेर नगरी का चौपट राजा है
कुछ नही बदलता है ये हिन्दुस्तान है यहाँ सब चलता है

हर तरफ़ माया है, कही ममता तो कही जयललिता है
बहुत से राजा है, कालमाड़ी है और रोज़ नया एक घोटाला है
खब्ररी हैं पर बिकने की उन्हे भी जल्दी है
जिन्हे लिख्नना है सच वो बन गए विवादी है
पी आर टी के चक्कर मे बना गरीब घनचक्कर है
कुछ नही बदलता है ये हिन्दुस्तान है यहाँ सब चलता है

बाहर कौन दुश्मन है यह सबको पता है
भीतर कौन बैठा जयद्र्थ है क्या पता है
मरने को तैयार देश का भविष्य है
कब्र मे लटकाए पाँव बैठा देश का नेतृत्व है
यहाँ तुल जाती एक ताबूत मे शहादत है
कुछ नही बदलता है ये हिन्दुस्तान है यहाँ सब चलता है

Monday, May 16, 2011

इशारा

जिनकी याद मे उम्र गुज़ार दी हमने, ए खुदा इशारा तो दे कि वो भी याद किया करते है हमे
जिन यादो मे हमारी सुबह शाम सजी रह्ती है, ए खुदा बता उनकी तन्हाईया सजाते तो हैं वो लम्हे॥

कहीं से कोई आवाज़ नही आती, पर यकीन है कहीं से वो भी पुकारा तो करते हैं हमें
इश्क की शिद्द्त पर इतना तो भरोसा है दूरियाँ लम्हों कि हो या सालो कि
आज भी मन्न्तों मे वो माँगा तो करते हमें

कौड़ियों मे बिकता था ईमान

कभी कौड़ियों मे बिकता था ईमान अब नही मिलता
बहुत प्रजातियाँ इस शताब्दी मे विलुप्त हो गयीं
ऐसे ही कुछ शब्द भी बेफूज़ुल से रखे हैं शब्द्कोशों मे
जो अब बेमानी से हो गये
बहुत दिन हुए मेरे मैं से मुलाकात हुए
जाने जीवन की इस आपा धापी मे किस आईने मे खो गया वो
मुखौटे उतारते अब डर लगता है
एक आदत सी हो गयी है चेहरे ओढ़ने की
कहते हैं बड़े हो जाना ही काफ़ी नही
समझदारी का सबूत देना भी पड़ता है
कई बार सच को छुपा झूठ कहना ही पड़ता है
वरना यह लोग हँसेंगे इसलिए मॅच्योर होना ही पड़ता है...
मनीषा

नग्मा

मेरे नग्मे नही किसी का दिल बहलाने का सामान
तेरे गुनगुनाने के लिए ये आशार नही कहे मैने
ये मेरे अरमानो के बिखरे से टुकड़े है
झलकता है जिगर का हर ज़ख्म जिन मे
हर हर्फ़ से टपकता है लहु ख्वाबो का मेरे

प्रतिक्रिया

डा कुमार विशवास कि कविता कुछ नसो मे ऐसी उतर गयी कि ये शब्द फूट पङे:

कैसे चलूँ तेरी ताल परआसमां तक मेरे पैरो के नीचे धरती बिछी है
तू उन्मुक्त आसमां का पंछी 
मेरे सिर से पाँव तक रिवाज़ों की बेडियाँ हैं,
तू अपने मन का रमता जोगी 
मेरी धडकन पर भी, कई सवाली पहरे है
तूने तो गीत लिख डाले अपने दिल की हर तड्प पर
जो मेरी खामोशियों मे दर्द है वो तेरे नग्मो मे हो नही सकता।
मैं तो मिट गई किसी कि आरज़ू भरी रातों मे,
जो मेरी शहनाईयो मे ज़हर था वो तेरी तन्हाइयो मे हो नही सकता।
आसान था मजनूँ के लिये पगला, दीवाना बन जाना
हर मीरा को वैराग का अधिकार मिल नहीं सकता
रिवायते कुछ दुनिया की कुछ फ़र्ज़ की मजबूरियाँ है
कैसे चलूँ तेरी ताल पर मेरे पैरो के नीचे धरती बिछी है
तू कवि है तेरे तरन्नुम मे सपनो की फ़ुलवारियाँ खिलती है
मेरे नसीब के आसमां को सितारे भी नसीब नही है
तू नाप आसमां की ऊंचाईयों को मेरे दिल को अब मचलने की आदत नही है
 मनीषा

आवाज़ हूँ अंतर मन की

मैं आवाज़ हूँ अंतर मन की, तुम्हारी चेतना अवचेतना के

बीच की कड़ी,
स्वीकारो या ठुकरा दो अपने आप से कैसे
भाग सकोगे,
जब सांझ ढलेगी और सूरज की लाली फैलेगी
लौटेंगे पखेरू जब घर को,
तब यादों के किसी कोने से मैं तुम्हे पुकारूँगी ॥
मुझे पोस के रखना,
वरना अंधियारी काली रातों मे,
चाँदनी मे और अमावस मे,
तकिये पटकते रहोगे चादर पर पड़ी सिलवटें सीधी करते

रहोगे
पर नींद कहाँ से आएगी?
वो तो मेरी खामोश चीत्कारों मे गुम हो जाएगी।
मैं आवाज़ हूँ तुम्हारे अंतर्मन की,
कहीं नही जाऊंगी,
तुम्हारे पदचिन्हों का लेखा जोखा हर आईने मे तुम्हे

दिखाऊँगी।
मैं सिर्फ़ आवाज़ हूँ अवचेतन मन कि एक झंकार हूँ॥

Sunday, May 15, 2011

तेरा घर मेरा काबा काशी

तेरा घर मेरा काबा काशी
तेरी आवाज़ आज़ान मुझे
जो तेरा फेरा कर लिया
फिर चार धाम किस काम मेरे

तू रामायण सी पावन
कान्हा की बन्सी सी मृदुल प्रिये
दरस जो तेरा कर लिया
सूत उपदेश की  क्या दरकार मुझे

कोई टिप्पणी नही आती!!!

मन रत है, रोटियाँ आसमान से नही बरसती
तन रत है, ज़िन्दगी लम्हो मे नही कटती
शब्द मूक है, लेखनी पर धूल पड़ी,सिर्फ़ इच्छाएँ किसी का पेट नही भरती
ज़िन्दगी यहाँ तपती धूप है, हर किसी को छाँव नही मिलती
इतनी बढ़ी ज़रूरत यहाँ कि मौत से भी अब रफ़्तार नही रुकती॥

चेतना

सब कुछ लुटा दे जो वही बैरागी हो जाता है
जिसकी चेतना जाग उठी वही कवि हो जाता है


फ़्रर्ज़ अदायगी कुछ ऐसी पडी मुझ पर कि हँसी  भी आँखो से लौट गई
कोई ज़रा मेरी बेबसी भी देखे मन घट से भी प्यासी लौट गई

Saturday, May 14, 2011

तुम कवि हो आह भर भी लेते हो

तुम कवि हो आह भर भी लेते हो
मेरी उदास चूडियाँ खनकती भी हैं तो सरगम सी लगती हैं
ये ससुराल की गलियाँ हैं यहाँ पायल भी खनकती है तो शोर सी लगती है।

सासुल कहती हैं बहु जितना पूछा जाए उतना ही कहो
ससुर कहते हैं घर की लक्ष्मी हो ज़रा आड़ मे रहा करो
नन्दी कह्ती है भाभी इतनी ज़ोर से ना हँसो
देवर कह्ता है भाभी चरण छूता हूँ बाबा से मेरे प्यार की बात करो
बलम कह्ते हैं थक के आया हूँ चलो कोई और बात करो
मन कहता है ज़रा फ़ुर्सत मिले तो छत पर जाया जाए
घूँघट की आड़ मे ही आँख भर आकाश देखा जाए

तुम कवि हो आह भर भी लेते हो
मेरी उदास चूडियाँ खनकती भी हैं तो सरगम सी लगती हैं
ये ससुराल की गलियाँ हैं यहाँ पायल भी खनकती है तो शोर सी लगती है।
सासुल कहती हैं बहु जितना पूछा जाए उतना ही कहो
ससुर कहते हैं घर की लक्ष्मी हो ज़रा आड़ मे रहा करो
नन्दी कह्ती है भाभी इतनी ज़ोर से ना हँसो
देवर कह्ता है भाभी चरण छूता हूँ बाबा से मेरे प्यार की बात करो
तुम कवि हो आह भर भी लेते हो
बलम कह्ते हैं थक के आया हूँ चलो कोई और बात करो
सब के बीच कभी खोजती हूँ उस अल्हड़ लड़की को
जिसके सपनों में सूरज ढलता और चाँद निकलता था
जिसकी खनकती बातों से सारा घर चहकता था
मन कहता है ज़रा फ़ुर्सत मिले तो छत पर जाया जाए
घूँघट की आड़ मे ही आँख भर आकाश देखा जाए
तुम कवि हो आह भर भी लेते हो
कैसे समझोगे तुम इस कवि मन से
भावाकुल मन की मजबूरी
सप्तपदी के सात पग में नापी जाती है
कैसे जन्म-जन्मांतर की दूरी
कैसे रंग जाती है जीवन रेखा इक पल में सिन्दूरी
तुम कवि हो आह भर भी लेते हो
कह्ते हो गीत लिखते हो , मेरी याद मे आँख नम भी करते हो
पर याद किसे करते हो, जो मैं थी या जो हो गई मैं अब
उस प्यारी मूरत को, माँ बाबा की लाड्ली को किस ठौर खोजते हो
तुमको सिर्फ याद बस पल भर की वो मासूम हँसी ठिठोली
मन के रागों पर केवल व्यर्थ गीत रचते तुम
दुनियावी बातों से क्या काज तुम्हे
तुम कवि हो आह भर भी लेते हो
तुम आसमाँ नापते रहे और मैं धरा होती रही
तुम चंद्र्मा से चमकते रहे और मै अमावस मे खोती रही
तुम्हारे हर अश्क से हर्फ़ बनते गए और मैं मूक चीत्कार करती रही
तुम मुझे बेवफ़ा कहते गए और मैं वो इल्ज़ाम बनती गई
ढलना था मुझे तेरे प्यार भरे गीतो मे और मै उदास गज़ल बनती गई
तुम कवि हो आह भर भी लेते हो
मनीषा 

Sunday, April 24, 2011

So True

No matter how busy you may think you are, you must find time for reading , or surrender yourself to self-chosen ignorance...