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Monday, February 27, 2012

मुझे तुम्हे भूलना होगा !

नाज़ था मुझे मेरी मोहब्बत पर

उस बेपरवाह से मगर उम्मीद थी कुछ कम

पूछा मैंने, उस से हंस कर

याद भी करोगे कभी तुम मुझे

मेरे जाने के बाद

उसने कहा , कैसे?

उसके लिए पहले मुझे तुम्हे भूलना होगा !

रौशनी पकड़ना चाहते हो


रौशनी पकड़ना चाहते हो ,
तो अपनी उँगलियाँ फैला दो
बंद मुठ्ठी  में अंधेरो के सिवा कुछ न पाओगे 
ख्वाहिश है अगर 
आसमान को छूने की 
धरा में अपने पांव बो दो वृक्ष सा उग जाओगे
समुद्र पी जाना चाहो अगर
तो मरुस्थल कि प्यास भी रखो
अन्यथा मन के भीतर 
थुलथुले सरोवर के सिवा कुछ न पाओगे
सच कहने कि चाह  रखते हो अगर तो
सच सुनने कि ताब भी रखो 
धरती में  चेहरा छुपाओगे  तो 
तप्त पत्थरों और आग के सिवा 
कुछ न पाओगे

अनायास मिले उस अजनबी के नाम जो मुझे सूरज दिखा गया 

मैं प्रतीक्षा रत थी

मैं प्रतीक्षा रत थी यह जानते हुए भी
 कि तुम नहीं थे इस पथ के बटोही,
पर फिर भी प्रतीक्षा थी कि 
कभी राहें भटक कर 
इस पथ से यूं ही मिल जायेंगी
और यह सूना पथ 
किसी पदचाप से बज उठेगा
शायद इसीलिए
मैं प्रतीक्षा रत थी,
बाँधे मैंने बंदनवार
पथ पर बिछा दिए खिले हरसिंगार,
और सजाए दीपों भरा थाल 
मैं प्रतीक्षा में रही खड़ी
तुम आए भी,
मेरी स्वागत तृषा बुझाने तुम आए भी 
पर तब,  जब पूजा के फूलों 
में कंटीली झाड़ियाँ फूट आयी थी
रास्ते पर कितने ही पथिक 
अपनी धूलि उतार गए थे
और बचा था 
मेरे प्रतीक्षारत नैनों में 
केवल  स्वागत भाव 
हर अपरिचित अजनबी के लिए ,
जो फेंक जाता था ,
मेरे लिए भूख मिटाने का सामान 

Friday, February 24, 2012

फुर्सत

सुबह की उजली धूप और गर्म चाय का कप


ज़िन्दगी में फुर्सत के बस इतने लम्हे काफी है

Thursday, February 23, 2012

गुनगुनी धूप में




गुनगुनी धूप में बेतक्कलुफ़ से कुछ लम्हे 
मन को सहलाते हुए कहते हैं
ज़िन्दगी इतनी ग़मगीन भी नहीं की तेरे 
बगैर उम्र गुजारी भी न जा सके
जा तेरा इंतज़ार छोड़ दिया 
मेरे हाल की खबर मुझे नहीं 
पर तेरे हाल पर तुझे छोड़ दिया  
ज़िन्दगी में मेरी आये ना आये 
दुआ है तेरी ज़िन्दगी में 
पतझड़ भी आये तो वसंत की तरह 

Wednesday, February 22, 2012

पुरानी डायरी



पुरानी डायरी के कुछ पीले पन्नो से 
बीते लम्हे कभी दस्तक देते हैं 
उन पन्नो के बीच रखा 
सूखा गुलाब
फिर महक जाता है
और एक पुराना ख़त
माफ़ी का, दिल को फिर छू जाता है
और उस बीती सुबह की सुनहली धूप 
मेरी खिड़की पर  फिर उतर आती है
और तुम्हारे साथ गुजरी हर  रात 
मेरी पलकों में ग़ज़ल सी गुनगुनाती है 

अ-मानव




मानव तुम, 
नहीं , पशु समान भी !
गढ़ कर दो पंक्तियाँ 
प्रशंसा में अपनी ही 
बतलाते हो 
स्वयं को ब्रह्म का उपहार
भली है तुमसे 
जड़-जीव , प्रकृति ही 
तुम तो हो केवल 
नृशंस -स्वार्थ  मूर्तिमान 

धरती ने कहा आकाश से


एक बार धरती ने कहा आकाश से
 मुझे अपना लो 
सितारों के इस जहान में बैठा लो
आकाश हंसा
दंभ से 
धरती की ओर झुका भी
पुलकित सी धरती दूर क्षितिज तक 
दौड़ती चली गई 
आकाश पाने को
तब आकाश पुनः हंसा 
और पहुँच गया एक नए छोर पर 
धरती फिर दौड़ी ,आकाश और ऊंचा उठा
और फिर एक दौड़ और फिर एक हंसी 
दौड़ और हंसी 
हंसी और दौड़
नए छोर नए क्षितिज खिंचते  चले गए
पाने में आकाश को धरती रही खुद को खोती
और आकाश निर्विकार रहा हंसता
उसकी पुलकों पर फिर भी रही धरती दौडती
पर, पर क्यों रही धरती दौड़ती ???
एक नई रचना एक नई संसृति जनमती रही दौड़ती 
धरती आकाश में लीन रह आकाश पाने को