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Monday, December 31, 2012

हे नारी ! तू पहचान

जीवन साथी ने तज दी  तो सीता कहलाई
दरबारों में लुटी तो द्रौपदी कहलाई 
किसी ने चुराया किसी ने दांव पर हराया 
पर मत भूल तू 
लिया जब रौद्र रूप तो दुर्गा काली कहलाई 
हर सीता को मर्यादा पुरोषोत्तम राम नहीं मिलता 
हर द्रौपदी को कृष्ण का चीर नही मिलता 
पर मत भूल तू 
किसी पुरुष को सिंह सवारी का मान नहीं मिलता 
तू  स्रष्टि तू ही काल 
तू जग जननी तू ही विनाश 
तूने ही पोसा है पुरुष का पुरुषार्थ 
पर मत भूल 
तू एक पल को बंद कर ले मुट्ठी 
रुक जाएगी धरती, रुक जाएगी  उस सृष्टा की सृष्टि 
जब तक भूली है तू अपनी ताकत 
तब तक ही तेरा विनाश 
हे नारी ! तू  पहचान 
हे नारी ! तू  पहचान 

Sunday, December 30, 2012

अजन्मी बच्ची



खरोंच कर कोख से तुमने निकाल दिया जिसे 
माँ तेरी वेदना से निकली अजन्मी बच्ची हूँ मैं 
जीना तो मैंने भी चाहा था पर मूक थी 
क्योंकि विशाता ने गढ़ी नही थी तब तक मेरी जुबां 
नही जानती थी जिनके मुँह  में रख भी देता है वो जुबां 
उस जन्मी बेटी की चीखे सुन सके ऐसे कर्ण वो नही गढ़ता 
आज धन्य मानती हूँ की मैं जन्मी ही नहीं 
जब मुझे ऐसे ही मिट मिट कर जीना था 
लोहे की सांखल से विक्षिप्त हो मरना था 
जीती तो भी क्या करती 
माँ  तेरे समाज की रीतियों की बलि चढ़ती 
शायद दो जून पूरे खाने को तरस जाती 
या दहेज की वेदी पर जल जाती 
जब तक जीती तब तक 
नोची खासोटी जाती 
आसपास से घूरती गंदी नज़रों  से कब तक बच  पाती 
मैं अजन्मी रही तो शायद अच्छा ही है 
तू माँ  अकेली मुझे कैसे पाल पाती 
कब तक मुझे बचाती 
जब तू भी तो विवश है 
मिट मिट कर जीने को 
फिर आऊँ माँ तब भी मुझे गिरा देना 
तेरी इस दुनिया से रूठ गई हूँ मैं 
जहाँ मुझे मेरे लिए  कोई देहरी नही मिलती 
तुझसे प्यार तो बहुत करती हूँ मै 
पर रोज़ रोज़  मरने  से बहुत डरती हूँ मैं 

मनीषा 


केदारनाथ

जब फलक तक दुआ उठे और नामंजूर हो जाए 
क्या करे इंसान जब खुदा  ही मजबूर  हो जाए 

Saturday, December 29, 2012

दामिनी

तेरी हैवानियत के आगे मेरी ज़िन्दगी  हार तो जाती है 
पर नही मिट्टी फिर भी ये जीने की चाह 
तू रौंद तो सकता है तन को मेरे 
पर मेरे वजूद को कुचल सके वो ताब तुझमे नही है 
मैं मर ही  गई तो क्या 
मुझ पर तूने सियासत कर भी ली तो क्या 
मुझे चुनवा दे चाहे तू अपनी मिनारों  में तो क्या 
मैं तेरे इतिहास के हर पन्ने से 
उभर आऊँगी 
मैं इस मिट्टी में मिल कर 
इस मिट्टी की बेटी बन उग आऊँगी 
तू मेरे एक अस्तित्व को नकार सके तो नकार 
मैं तुझे हर घर हर चौराहे पर खडी मिल जाऊँगी 
तू मुझे मिटा सके तो  मिटा 
मैं तेरे भीतर 
तेरी आत्मा की आवाज़ बन जाऊँगी 
मनीषा 

Monday, December 24, 2012

नेता जी का कथन


यह  कुर्सी बहुत प्यारी है 
उसे न छोड़  पाऊँगा 
सब हथकंडे अपनाऊँगा 
तुम आवाज़ उठाना चाहते हो 
और क्रांति लाना चाहते हो 
तुम शोर बहुत मचाते हो 
कभी लगता है मेरी कुर्सी ही 
उखाड़ना चाहते हो 
बस और नही मैं सह सकता 
ये शोर बहुत डिस्टर्बिंग है 
मैं सुन नहीं सकता 
बहुत समझाया है तुम्हे 
तुम नग्न शून्य हो 
मेरे लिए केवल कुर्सी का पथ -मार्ग हो 
जरा से वोटो की गिनती हो 
तुम सोचते हो तुम ही सारी सृष्टी हो 
क्या उखाड़ लोगे 
थोड़ा झंडा जो फहरा लोगे 
और चीख पुकार लोगे 
मेरे पास सत्ता है बहुमत है 
ये संविधान  है 
और मेरे पास सौ विधान है 
तुम्हारी हर समस्या का जानता हूँ
 बस एक निदान है 
लाठी बम और गोले बहुतायत में हैं 
तुम्हारे संग रोने को अश्रु भी मेरे लालयित हैं 
कहो किस बात से मानोगे 
पिसोगे रोज़ी की चक्की में
 या इस बार सैन्य  बल से हारोगे 
मेरी कुर्सी बहुत प्रिय है 
माफ़ करना तज नही सकता  
फिलहाल तुम्हारे लिए 
कुछ कर नही सकता 
मनीषा 

सपनों में तुम आती हो


सपनों  में तुम आती
हो नित नई लोरी गाती हो
फिर क्यों हर सवेरे चाँद सी खो जाती हो
माँ क्यों मुझे तुम छोड़ जाती हो
नही चीन्हती  तुम्हे
पर ढूँढती   अवश्य हूँ हर चेहरे में
सोचती हूँ कभी तो आओगी
हौले सहलाओगी मुझे
या दोगी  कभी गालों  पर  भारी थपकी
तब माँ तुम्हारे स्पर्श से तुम्हे पहचान लूँगी
और तुम्हे जान लूँगी
कहो माँ ! क्यों तुमने दिया मुझे भुला
आश्रम की अम्मा कहती हैं
पड़ी मिली  था मैं भी उसी झूले में
जिसमे कल ही आई है प्रिया
और ऋचा  और कविता  भी मिले थे उन्हें उसी झूले में
कहो माँ क्यों छोड़ देते हैं लोग
हमें झूलो में ,कूड़े पर या मंदिरों में
कभी कभी कुछ जोड़े आते हैं
कहते हैं हम ही तुम्हारे माँ बाप हैं
और छांट कर उसी तरह
जैसे छांटते  हो गाय कोई
ले जाते हैं अपने साथ कहीं
पर अम्मा कहती हैं वे भले लोग हैं
देते हैं सहारा दीन अनाथों को
क्या माँ मुझे भी कभी कोई ले जाएगा
या तुम ही आओगी ?
संग अपने मुझे ले जाओगी
लोरी गा गा कर सँग अपने सुलाओगी
कहो माँ क्या सच तुम कभी आओगी ?
मुझे संग ले जाओगी ?
मनीषा

कोरा सच


व्यंग रचूँ या हास्य
क्या बदल जाएगा कुछ
तुम मुझे स्वयं को रचने दो
कभी अपनी पीड़ा भी तो कहने दो
मैं क्यों तुम्हारे लिए लिखूँ
निबोरियों पर क्यों चाशनी लपेट रखूँ
प्रस्फुटित  होने दो काँटे  मेरे बदन से
मैं तुम्हे चुभना चाहती हूँ
तुम्हारी आँखों में खटकना चाहती हूँ
और सुनो तो कहूँ
मैं कोरा सच लिखना चाहती हूँ

जब भी झांकती हूँ


जब भी झांकती हूँ 
अपनी ज़िंदगी के खाली पन्नों  के बीच 
तो उसमे जीवन जैसा कुछ नही मिलता 
मिलते हैं तो लम्हों के टुकड़ों में बंटे 
उम्र के कुछ चिन्ह 
जिन्हें चांदी का वर्क लगा 
बीड़ों  की तरह 
किसी बेशकीमती तश्तरी में 
सजा  दिया गया  हो 
और कभी  मैं वर्क की मढ़ाई 
देख पुलक जाती थी और 
अपने पर इतरा जाती थी 
पर अब वर्क की  चमक 
कुछ धुंधला सी गई है 
अब वर्क उतरता जा रहा है 
और मिटता जा रहा है मेरा भ्रम 
बीड़ों  से सूखते उस रस की तरह 
जिसके सूख जाने पर उन के भीतर 
रह जाती है 
कोरी कड़वाहट 
शायद मेरी ढलती उम्र की तरह 
मनीषा 

कल पूछा था मेरे नन्हे ने


कल पूछा था मेरे नन्हे ने
माँ ?
 मैं हिन्दू  हूँ , वो सिख
और वो ईसाई कैसे पता चलता है ?
मैंने उत्तर दिया,
जो तुम्हारे माता पिता  का धर्म बेटा,
वही तुम्हारा होता  है .
उसने कुछ सोचा और फिर पूछा
तब माता पिता  को कौन बतलाता है
उनका धर्म क्या होता है
मैंने सरल प्रश्न का दिया सरल उत्तर
उनके माता पिता
तब वह कुछ गंभीर हो गया
और तब उसने वह पूछा ;
जिसका जवाब सिर्फ वह दें
जो धर्म को जान गए हैं
अपना अंतर मन पहचान गए हैं
प्रश्न था बस इतना
जो दुनिया में पहले माता पिता  थे
उनको किसने बतलाया था ?
कि,  उनका धर्म कौन सा है ?
वो मेरा चेहरा ताक  रहा था
और मैं निरुत्तर खडी
बगले झाँक रही थी
मनीषा

शब्द कहाँ से लाऊँ

शब्द कहाँ से लाऊँ जो इस आक्रोश को व्यक्त करे 
स्वर कहाँ से लाऊँ जो नारी तेरी दुर्दशा को व्यक्त करे 
शुद्रो से निम्न स्थिति जिसकी है 
दलितों से बदतर गति जिसकी है
 कोख  में उसके सारी स्रष्टि है 
है कौन वो ?
दरिद्र 
मूक 
शोषित 
नर की बांदी 
 वह तू - स्त्री है 
छल से बल से सम्मति से 
पुरुष ने जिसको सदा ही भोगा
आह! तेरे तन के आकर्षण में 
निहित मैंने नारी तेरा ही दुर्भाग देखा 
मानव की श्रेणी से वंचित पाया तुझको 
जड़ जीव सा मैंने  तेरा उपभोग देखा 
इस हाथ से उस हाथ मैंने तुझे बिकते देखा 
घर की चार-दीवारी हो 
या तन का बाज़ार 
नारी मने तुझे सदा नर से नीचे देखा 
सत्ताओं की नीव पर 
या मंडप की ओट  हो 
मैंने, तुझे ,
सदा बलि सा चढ़ता देखा 
स्वार्थ की वेदी पर मैंने  तुझे 
मानुष से इतर देवी बनते देखा 
कितने विशेषणों में मानी तुझे जड़ा  पाया 
तुझे तेरे अस्तित्व से बस जुदा होते देखा 
मेना , वामा , पुरन्ध्री स्त्रियः से 
ग्ना भी  मैंने तुझे होते देखा 
राम,अर्जुन  गाँधी हो या हो सर्व साधारण जन 
सब में मैंने केवल भुक्त भाव देखा 
नारी मैंने तुझे क्षण क्षण स्रष्टि की यज्ञवेदी पर
स्वाहा होते देखा 
मनीषा 



बहुत लोग राम और गाँधी के नाम पर हो सकता है बुरा माने पर इससे पहले वो कुछ कहे मैं बस इतना ही कहना चाहती हूँ मुझे लगता है राम ने सीता और गाँधी ने कस्तूरबा को औरत या एक स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं समझा। हाँ पत्नी का सम्मान तो दिया पर उनके अपने व्यक्तिगत विचारों का सम्मान नही किया जो आज भी शायद ही कोई पुरुष कर पाता है। 


Friday, December 21, 2012

करती हूँ प्रतिकार तुम्हारा


करती हूँ प्रतिकार तुम्हारा
मुझे दिखा दीन हीन तुम, अपना अहम बढ़ाते
कुचल मसल मेरी अस्मिता, तुम स्वयं का पुरुषार्थ दर्शाते
करती हूँ प्रतिकार तुम्हारा
पुत्र, भ्राता,स्वामी,सखा तुम नहीं अब नाथ मेरे
नही मैं अब धरा सी तुम्हे  देव मान
सब कुछ चुपचाप सहूँगी
अब बंधन सब तोड़ मैं दरिया तूफानी सी बहूँगी
करती हूँ प्रतिकार तुम्हारा
है हक़ मुझको भी जीने का उतना ही
है हक़  मुझको शिक्षा का उतना ही
है हक़ मुझको स्वप्न देखने का उतना ही
कन्या तो हूँ पर अब दान नही दी जाऊँगी
मैं बालिका वधु ना कहलाऊँगी
और माफ़ करना अब तुम
कच्ची  उम्र में मैं, माँ ना बन पाऊँगी
करती हूँ प्रतिकार तुम्हारा
नही अब करूंगी घूँघट, तोड़ फेकूंगी ये चूड़ियाँ
बेड़ियों से लगते हैं मुझको ये बिछिये ये पायल
तुम्हारे संस्कारों  के भुलावे में ना मैं आऊँगी
ना रस्मों के छलावों से और छली जाऊँगी
तुम जो हाथ उठाओगे मुझ पर
मैं ना सातों वचन निभाऊँगी
जीवित व्यक्ति हूँ घुट घुट कर न मर पाऊंगी
करती हूँ प्रतिकार तुम्हारा
संग तुम्हारे चल सकती हूँ पीछे पीछे न चल पाऊँगी
तुम्हारे प्यार में खुद को होम न कर पाऊँगी
खुद ना हँसी तो तुम्हे कैसे खुश रख पाऊँगी
कैसे प्यार का नीड़  बनाऊँगी
करती हूँ प्रतिकार तुम्हारा
तुम्हारे अहम् के लिए खुद को ना मार पाऊँगी
संग तुम्हारे चल सकती हूँ पीछे पीछे न चल पाऊँगी
संग तुम्हारे चल सकती हूँ पीछे पीछे न चल पाऊँगी
मनीषा

Wednesday, December 19, 2012

संवेदना नहीं मुझे अधिकार चाहिए


बहुत नेता आज अलग अलग टीवी चैनलों पर संवेदना प्रकट कर रहे हैं। कुछ रो भी रहे हैं, कुछ नाराज़ भी हैं। पर क्या ये काफी है हमारे लिए ? क्या सिर्फ कानून होने से हम सुरक्षित हो सकेंगे? 

संवेदना नहीं मुझे अधिकार चाहिए 
सडक पर सुरक्षित चलने का अधिकार चाहिए 
बेटी ,माँ या देवी की उपाधि नहीं 
मुझे मेरे व्यक्तित्व का अहसास चाहिए
पुरुषों से आगे निकलूँ यह अरमान नहीं
कदम से कदम मिला चलने का अधिकार चाहिए
अबला मत कहना मुझे
ना ही दूध और आंसू मेरे कविता में गढ़ना तुम
मेरे आँचल में मुझे जीने का सम्मान चाहिए
मेरे पहनावे पर टिप्पणी नही
तुम्हारी आँखों में शर्म चाहिए मुझे
संवेदना नहीं मुझे अधिकार चाहिए
बहस करो तुम सत्ता के गलियारों में 
घोषणा करो तुम मुआवजों की अपने सम्भाषणों में 
वादे सख्त कानून के कर दो तुम यूँही लोकसभाओं में 
पर सच तो यह है मुझे स्वतंत्रता चाहिए तुम्हारे विषाक्त विचारों से 
मुझे स्वछंदता चाहिए तुम्हारेशब्दीय तीर कमानों से 
पोसो तुम अपने रक्त को ऐसे की धिक्कारे नही मेरी  कोख 
मुझे न गोपियों के कृष्ण चाहिए ना सीता के  राम चाहिए 
न राम का राज्य ना धृतराष्ट्र  का दरबार चाहिए 
मुझे एक नई परम्परा चाहिए 
मुझे नया इतिहास चाहिए 
मुझे सिर्फ मेरे अस्तित्व का अहसास चाहिए 
मुझे भी जीने का अधिकार चाहिए 
संवेदना नहीं मुझे अधिकार चाहिए 
मनीषा 

Sunday, December 16, 2012

रिश्तों के भंवर

अब तो हर काम अधूरा रहता है 
सब गैर ज़रूरी लगता है 
मेरे लिए कोई अब कहाँ कुछ करता है 
जो चाहिये खुद ही लाना पड़ता है 
सब्जी का थैला लौटते में भारी लगता है 
जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह 
अपना उपहार खुद ही ले आना पड़ता है 
आईने देखने की फुर्सत नहीं मिलती 
मेरे तिल पर कोई कविता लिखी नहीं मिलती 
हाथ की मेहंदी अब छूट चुकी है 
बसंती साड़ी का मौसम अब नहीं आता 
सावन मेरा मन नहीं महकाता 
जब जब पैरमे थकन चढ़ती है 
तेरी दी हुई पायल कहीं ख्याल में खनकती है 
आँख तक आते तो हैं पर छलकते नही हैं 
काम करते मेरे हाथ थकते नहीं है 
फिर भी खाली पल आ बैठते हैं 
तेरे सवाल अब चुभते नहीं है
तू वैरागी कवि बन भटकता है 
मेरे पाँव से रिश्तों के भंवर उतरते नहीं है

Friday, December 14, 2012

मैं अभिशप्त हूँ

मैं अभिशप्त हूँ 
जीने के लिए 
पल पल जलने के लिए 
और निरंतर लिखने के लिए 
भीतर कुछ मर सा गया है 
फिर भी विवश हूँ हंसने के लिए 
रोज तन को घसीटती हूँ 
इधर उधर 
और रात होते मर जाती हूँ 
फिर भी विवश हूँ साँस लेने के लिए 
खुद मरती हूँ खुद को जीती हूँ 
रोज़ रोज़ ये प्रसव वेदना मैं  सहती हूँ 
क्योंकि 
मैं अभिशप्त हूँ 
जीने के लिए 
पल पल जलने के लिए 
और निरंतर लिखने के लिए 

Wednesday, December 12, 2012

कुछ रस्मे रिवायते हैं

कुछ रस्मे रिवायते हैं 
कुछ दिनचर्या की मजबूरियाँ 
जो  सपने अकसर  दम तोड़ देते हैं 
दहलीजों के भीतर 

Sunday, December 9, 2012

ऐसे बीत जाते हैं लम्हे

ऐसे बीत जाते हैं लम्हे जैसे मुट्ठी से फिसलती है रेत 
खुशनुमा लम्हों का मिजाज़ ही कुछ ऐसा है 
चादर की सिलवटे समेटते गुजरती है लम्बी रात
तेरी याद का सिलसिला ही कुछ ऐसा है 

Friday, December 7, 2012

खिड़की से झांकती

खिड़की से झांकती उस हरी पत्ती पर 
ढुलक रही ओस हूँ मैं 
 गगन पर चमक बिखराते  चाँद 
से टपक गई ज्योत हूँ मैं 
तुम्हारे बिछौने पर पड़े 
सफ़ेद तकिये की 
नर्म गोद हूँ मैं 
स्नेहिल हाथों से जो तुम्हे सहला रही है 
उस पवन की सुगँध  हूँ मैं 
किसी हथेली पर रची 
मेहंदी की लाली हूँ मैं 
किसी अप्रतिम कवि की कलम से छिटकी 
नव रचना हूँ मैं 
किसी बिरही की आह से उपजे गान की 
लय हूँ मैं 
रोज़ शाम को तुम्हारे अधरों पर थिरकते 
गाने के बोल हूँ मैं 
क्यों खोज रहे हो मुझे तुम 
इन पाषाणों  के जंगल में 
तुम्हारे अंतर में छिपी मधुर मृदु 
मादक याद हूँ मैं
1992

एक कतरा धूप का

आज रोटी बेलते हुए एक कतरा धूप का ,
मेरा हाथ छू गया ,
और दिल मेरा भर गया ,
मानो , जैसे सूरज ने दिया हो पैगाम ,
बहुत परदों  के बीच बंद हो तुम 
पर तुम को भूला नहीं मैं 

रोशनी के कतरे



खिडकी से झांकती 
सामने की दीवार पर 
अठखेली करते रोशनी के कतरे 
उस खिलखिलाती धूप की 
याद दिलाते हैं 
जो अम्बर की खुली छत के नीचे
धरती के असीम आँगन पर फैली है ।
है क्या यह?
रिश्ते-बंधन-संरक्षण -परम्परा ?
या कोरी जड़ता?
अथवा स्वयं में पनपी असुरक्षा 
जब परम्परा अपनी नींव से उखड कर 
पुन; स्वयं  को प्रतिष्ठित 
करने की कोशिश में
 सड़ांध मारती एक लाश सी हो जाती है 
तब, हाँ तब वह छीन लेती है 
व्यक्तियों से उनका अनंत क्षितिज 
और धरा का सुन्दर-मृदुल विस्तार 
और व्यक्ति के व्यक्तित्व का वैराट्य 
और बिठा देती है उन पर संस्कृति के पहरे 
डाल  देती है खिड़की और दीवारों पर परदे 
और ढक  देती है चेहरों पर  घूंघट और नकाब 

मेरे पथिक !

मेरे पथिक !

कहो, कैसे स्वागत करूँ तुम्हारा ?

भीगी पलके, मुस्काते नयन और थर्राए अधर ,

सभी कुछ तो असमर्थ हो गया है,

उस स्पन्दन की अभिव्यक्ति में।

कैसे कहूँ , तुम्हारा आना कैसा है ?

शायद कुछ ऐसा, जैसे किसी ठिठुरती सर्दीली रात में ,

आग का तापना

या तपती धूप में रेतीले मरुस्थल के बीच ,

घने बरगद की छाँव पा जाना ।

तुम्हारा मेरे जीवन के समर में आना,

कुछ ऐसा है,

जैसे किसी शांत दोपहर में

गाँव की अमराइयों में गूंजती बंसी की मधुर लहर हो

हाँ !, ऐसा है तुम्हारा आना

जैसे किसी अनजाने शहर में,

किसी आत्मीय से भेंट हो जाना

पर, मैं तुम्हे कैसे बताऊँ

कि क्यों मैं मूक आवक खड़ी रह गई हूँ

तुम्हे इस तरह जीवन पथ पर मिल कर

मेरी भावना काव्य-गद्य सभी से परे ,

कुछ हट कर, किसी अनजाने अनदेखे रूप में,

तुम्हे वर लेना चाहती है

पर उन प्रतीक्षाओं से भारी तल्ख़ निशाओं के उपरान्त

सुनहरे उजाले से भरी ये नई प्रात: मे मैं,

विस्मित रह गई हूँ

मेरे अंग्शिथिल और विचार शून्य से हैं

मेरी भावना,

अपने शिशु से बिछुड़ी मादा हिरनी समान शब्द खोज रही है

भंगिमाए खोज रही है

नए अलंकार तलाश रही है तुम्हारा अवलोकन करने को

अविश्वनीय सा ये सरल पथ निहार रही है,

अवरोध हीन भी हो सकता है क्या, ये पथ ?

ओ! मेरे पथिक,

मुझे उबार लो

और मेरे अंग प्रत्यंग में उपजी इस अनिश्चित सी पुलक को एक आधार दो

कह दो! ,

कह दो!. पथिक की तुम आ पहुंचे हो

इस सुनहली धूप से आ पहुंचे हो!

मेरे आँगन में ही नहीं, मेरे जीवन में भी।




6  दिसम्बर 1992




Thursday, December 6, 2012

मुझे चाहिए एक घर

मुझे चाहिए एक घर
जिसके आंगनमे उगती हो उषा
और खिड़की से रोज निकलता चाँद हो
मैं तुम्हारा मकान लेकर क्या करूँगी
जहाँ हर किसी का अपना एक कमरा है सुसज्जित
अपने में स्वच्छ और सम्पूर्ण
मुझे तो चाहिए एक घर
वह घर जहाँ
हर कोई एक हाथ की दूरी पर हो
जहाँ पढ़ी हो सबने एक दुसरे  के मन की पाती
जहाँ सुबह किसी एक का गुनगुनाया हुआ गीत
सांझ तक हर एक के कंठ मे सजाता हो
उस घर में चाहिए  एक आँगन भी
जहाँ  रंग बिरंगे पंछी चुगते हो दाना
जहाँ रात में चादर ओढ़ सोता  हो कोई
और सुबह उस चादर में लिपटा
मिलता हो और कोई
एक  ही तकिये की खींचा तानी  में  गुज़रती हो रात
छिपी न हो एक दूसरे से कोई  भी बात
अलमारी पर धूल  चमकती हो
रोशनदानों से जाले  लटकते हों
पर चूल्हे पर प्यार की रोटी सिकती हो
बच्चों के हुल्लड़ से घर गुंजित रहता हो
बहुत मन मुटाव हो फिर भी दिलों में प्यार हो
सब सुख दुःख एक दूसरे से साझे हों
बोलो क्या तुम दे सकते हो मुझे एक ऐसा घर
जिसमे साथ निकलते, सूरज और चाँद हो।।

Wednesday, December 5, 2012

जीवन मेरा रीत गया

जीवन की इस आपाधापी में 
बहुत कुछ है जो हाथ से छूट  गया 
कहाँ वक्त मिला जो दो पल मैं रुक पाता 
एक बार मुड़ कर बीते पल जी पाता 
आज कुछ लाना है, कल कही जाना है 
जीविका भी तो कमाना है 
इस उलझन में ही मेरा जीवन रीत गया 
बहुत धूप थी मेरे आँगन में 
ज्वलनशील था ये पथ मेरा 
पल  भर की छाँव ढूँढने  में ही जीवन मेरा रीत गया 
बहुत बार मन किया तुमसे बात करने का 
बहुत बार मन को समझाया की कल करूंगा 
आज व्यस्तता कुछ ज्यादा है 
बढ़ते हाथों को रोक लिया फोन मिलाने से  
काम बहुत अधिक था और समय बहुत कम मेरे पास 
आज नहीं कल में जीवन मेरा रीत गया 

प्रांगण-Bal Bharti Public school Alumni night


मैं लौट रही हूँ अपने प्रांगण  में 
बरसों  बाद एक आस लिए 
कूदते फुदकते वो लम्हे ले कर 
लौट  आयी है वो मृदु स्मृतियाँ भी 
मिलेंगे शायद वो मीत वही
अपने बालो में अनुभव की सफेदी लिए 
कुछ परिचित, कुछ अपरिचित 
कुछ अपरिचित हो कर भी परिचित 
मन में बस एक आस लिए 
जी लेने को पुनः वो लम्हे 
जिनमे घिरी रहती हैं मेरी  शाम अक्सर 
बहुत समय बाद ,हमजोलियों की टोली होगी 
हँसी और ठहाके होंगे 
भोली शरारतों की  स्मृतियाँ 
फिर मन को गुदगुदा जाएँगी 
पुरानी गप्पे फिर दोहराई  जाएंगी 
एक दुसरे के राज़, कई हमजोली  खोलेंगे 
बहुत कुछ हम एकदूसरे से बिना बोले ,बोलेंगे 
वो शाम जानती हूँ मुझे मुझसे मिला जाएगी 
इसलिए  एक बार फिर अतीत के पन्ने पलटने को 
 मन में एक उमंग ,पाँव  में एक थिरकन लिए 
लौट रहीं हूँ आज मैं अपने प्रांगण में 

मेरी छाती का क्रंदन हा! ये रुदन

मेरी छाती का क्रंदन 
हा! ये रुदन 
ये मेरे भीतर छिपा संताप 
शब्द न तोल पाते जिसे 
ये कैसा विलाप 
विश्व हंसा करता विह्वल होता 
मैं केवल सदा ही रोया करता 
नही निष्पक्ष, नहीं निर्विकार 
मेरे भीतर ये कैसा चीत्कार 
पल पल घुटता जाता मन 
मैं युग युग से संतप्त 
फिरता बैरागी 
लिए मन में एक चिर उदासी
 कैसी  सूली ये बाल मन 
नित चढा  करता 
हा! ये कैसा अभिशाप 
हा! ये कैसा विलाप