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Sunday, December 29, 2013

मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले

मैंने तो  चलना ही था इस डगर पर अकेले ही
तुमने क्योंकर पुकार लिया यूँही
किसी अतीत के कोने से आकर दे दी दस्तक
मेरे मन के अंधेरो पर अपने उजालों  की

मेरे बिखरे मन को तुम आज क्यों समेटना चाहते हो
अपने वक्ष में क्यों मेरा वजूद बसाना चाहते हो
क्यों जकड़ना चाहते हो मुझे अपने बाज़ुओं में
मैं तो रो ही रही थी बरसों से हर बरसात में
तुम किसलिए  अब मुझे अपना कांधा  देना चाहते हो
ओ! आनेवाले अजनबी तुम क्यों मुझसे परिचित होना चाहते हो
मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले
तुम क्यों मेरा साथ देना चाहते हो

लौट जाओ ,
यहाँ बहुत कंटक है मन के भीतर
इनमे कैसे फूल खिलेंगे
मन में जो अब संवरते नही उन बेरंग मौसमों में कैसे रंग भरेंगे
तुम  थाम  तो रहे हो मेरा हाथ हम कैसे संग चलेंगे
तुम्हारे रास्तों पर फुलवारियां है
मेरे रास्ते बीहड़ो की ओर जातें  हैं
तुम लौट जाओ यहीं से
मेरे पास पाने को कुछ भी नही है
और तुम्हारे पास खोने को है बहुत कुछ
मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले
मनीषा

Saturday, December 28, 2013

मैंने तुमसे मोती पाए

मैंने तुमसे मोती  पाए
जीवन के इस संघर्ष में
रहे तुम एक सहज दिलासा
मैंने तुमसे मोती पाए
जब जब मुझे तम ने घेरा
तुमने मेरे पथ पर बिखेरा उजेला
मैंने तुमसे मोती  पाए
थक कर चूर हो गई जब पाँखे
तुमने मेरे लिए आसमां झुकाए
मैंने तुमसे मोती  पाए
बहुत  दुर्गम  थी मेरी राहें
तुमने मेरे हर पग मेरे छाले सहलाए
मैंने तुमसे मोती  पाए
हमकदम कैसे कहूँ  तम्हे
चलना तो था मुझे ही अकेले
पर तुमने मेरे सन्नाटे बुझाए
मैंने तुमसे मोती  पाए
मनीषा 

जन्मों का रिश्ता

सात फेरे और बस
बीते बीस साल
का जीवन नगण्य
ॐ भूर्भव: स्व:
की  ध्वनि के साथ
हवन कुंड कीअग्नि में स्वाहा
कितना असत्य है यह
या कितना सत्य था वह
कहते हैं सर्व त्याग दो
तन से , मन से , धन से सम्पर्ण
देहरी लाँघ बन जाना मर्यादा सबकी
बेटी से बहु
कन्या से ब्याहता
इक रात का सफर
और जन्मों  का रिश्ता
क्षण  में बंध गया
और एक कागज़ से टूट गया
कैसा नाता है यह ?
मानो तो सबकुछ
न मानो तो कुछ नहीं …
मनीषा 

Friday, December 27, 2013

मन करता है

गुज़र जाते हैं हमारे बीच कितने
अनकहे  दिन अनकही  रातें
कहो कब खत्म होंगी दीवारों से बाते
नयन जब भी पा जाते कुछ ऐसा
जो हर्षित तुमको भी किया करता
मन मचल जाता वहीं कहीं
तुमको पास बुलाने को
कितनी संचित स्मृतियाँ
अतीत के पुलिंदों  में दफन हुईं
कितनी सूनी रातें सपनीली बातें
सिर्फ करवटों में गुज़र गईं
अब एक
लम्बी सुनहली धूप चुराने को मन करता है
थोड़ी चाँदनी  छिटकाने को मन करता है
शाम की इन उदास क्यारियों में
एक नन्हा सुख उगाने को मन करता है
आज संग तुम्हारा पाने को मन करता है

by me मनीषा

टूटन

कच्च  से टूटा है कुछ
पर क्या?
सपना?
सपनों  के टूटने की आवाज़ नहीं  होती
कभी ध्यान से सुनो तो
सुनाई देती है सिर्फ
एक धीमी सी सिसकी
खिलखिलाते होंठों  के बीच दबी
देखो गौर से
तो शायद चमक जाएँ
पलकों के भीतर सूखे आँसू
और जानो तो
उस मस्त चेहरे पर नज़र आ जाएँगी
दर्द की गहरी लकीरें
उस हंसते चेहरे पर खिलते चुटकुलों के बीच
खाली सूनी गहरी आँखे
उसके अंतर का परिचय भी दे जाएँगी
और किसी सपने की ताज़ी लाश
अपना अक्स दिखा देगी
आँखों के नीचे पड़े काले गहरे गड्ढों में

by me मनीषा

चूड़ियाँ

साथ चाहिए तुम्हारा
इन्हीं  चूड़ियों सा
जो संग रहें  तो खनकती हैं
उतरें तो मौल  जाती हैं
जब सजती हैं किसी कलाई पर
तो सूनापन  ढाँप  देती हैं
और कोरे हाथ खिल उठते हैं
हास्य परिहास से
साथ चाहिए तुंम्हारा
इन्हीं चूड़ियों सा
by me मनीषा 

सौंपती हूँ स्वयं को

ले आई थी कभी मैं भी माणिक पुष्प भर
इस मानस  घट से
और तुमने लौटा दिया था द्वार से
मेरा धरा बन  जाना ही यदि  तुम्हारे
अधरों पर मृदु हास का उजास बिखेर सकता है
तो अब धूमिल हो जाना ही मेरी साध है
लो आज सूत्र नही सौंपती हूँ स्वयं  को
उस सूखी ज़मीन के रूप में
जिस पर तुम बिखर सको टूटे कांच से

मनीषा 

अनकही

एक अधूरी  कहानी
कुछ चुप से शब्द
छतें टापती  वो बातूनी आँखों
शरमा  कर झुकती  पलकें
और चहचहाते पक्षियों के पंखो के नीचे
फागुनी मौसम की अंगड़ाई में
कपकपाती अँगुलियों के पोरों  को  महसूस
करते दो हाथ
और अनजाने डर  का  वो नाज़ुक सा स्पंदन
बस यही तो
इतनी सी कहानी है
अनकही  अनबूझी पहेली सी
ज़िंदगी की

by me मनीषा


व्यक्त

कहाँ  व्यक्त कर पाती हूँ
बस भरती  ही जाती हूँ
अपने मन की फैली झोली में
सहेजती जाती हूँ
सारी मौन व्यथाएँ
और दिन दिन बढ़ते आते हैं
असंख्य अनगिनत
हादसों से कँपाए  लोग
अपने अनाम चेहरों पर
दर्द की लकीरें लिए
कांधो पर दुःखती  स्मृतियों का
बोझ लिए
छलके ही आते हैं
मेरे साथ बाँटने स्वयं  को और मुझे
कब जान पाई हूँ मैं
इन निराश व्यक्तित्वों की पीड़ाओं का माप
फिर भी सर झुकाए
बांटे ही चली जाती हूँ
दिए ही जाती हूँ अपना एक हिस्सा
इन इतिहास और अनुभव की हर कहानी पर
जो समोए है एक जिंदगी अपने ही भीतर
हर इतिहास हर किस्सा जीवित है
अपनी ही नक्काशी लिए
फिर भी मानों  सब है अलग
जैसे किसी शहर में बसे पुराने खंडहर हों
और मेरी लेखनी से उतरते शब्द भी
इस अथाह संसार में
डूबती उतरती बूंदे हैं
जो बहती हैं किसी मोती  कि तलाश में
और हर सागरिक
अपनी ही तृषा बुझा इनसे चल देता है
हाथ पोंछ अपने ही किनारे की खोज में

by me मनीषा

Sunday, December 22, 2013

मैं

मैं बार बार लहरों  सी तेरे तट
से लौट जाती हूँ
सागर में हूँ समाहित
फिर भी प्यासी रह जाती हूँ 

मेरे लिए सजन तुम आए ही कब पास मेरे

मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे
शून्य ही तो था हमारे मध्य
और शून्य के दायरों में ही विलीन हो चला है
हमारा संबंध
तुम आए ही कब रिश्तों के धागे जोड़ने
मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे

फिर  न जाने कितने पल हमारे मध्य
इस अंतराल में जुड़ते चले गए
और हम-मैं और तुम में बदलते रहे
तुम आए ही कब सजन
अपने मैं को मेरे मैं से जोड़ने
मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे

अंतहीन प्रतीक्षाओं के उपरांत भी
रीता  ही रह जाना था पथ
पथ -धूलि से केवल कैसे भरती  यह झोली
रिक्त ही रह जानी थी मेरी मांग
मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे

यह जान कर  भी सजन मेरे
मैंने की थी प्रतीक्षा , बाँधा था स्वयं  को तुमसे
और तुम्हारी नि:संगतता को चाहा था
मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे
मझे सहेजने सजन मेरे
मुझे समझने सजन मेरे
मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे

by me मनीषा 

यदि हम संग रोते संग ही हँसते

कितना अच्छा  होता 
यदि हम संग रोते संग  ही हँसते 
संग ही भीगते बारिश  की बूंदों में 
और नहा जाते सर्दी की धूपों में 
कभी बच्चे बन जाते तो कभी 
रूठते तुम तो मनाती मैं 
और मेरे रूठने पर तुम रिझाते 
मन की उच्छ्रंखलता रहती चंचलता नैनो में 
कभी रजाई के भीतर बैठे दोनों देखा करते फिल्मे 
मैं डरती तो दुबका लेते तुम 
मेरी उलझनों को पल मे सुलझा देते तुम 
तुम्हारे मेरे दुःख साझे होते 
एक दुसरे  के बिन  बोल हमारे अधूरे होते 
जो तुम न कहते वो भाँप  लेती मैं 
मेरा अनकहा जान  लेते तुम 
कितना अच्छा  होता
यदि हम संग रोते संग  ही हँसते 

वचन

कहाँ चूक गई मैं ?
कहाँ हो गई भूल पथिक
जो कहते हो
मेरे अंचल से तुमने कंटक ही पाए

मैं तो पुष्प भर लाई थी
अपने इस मृदु अंचल में
पर कैसे यह चुभ गए तुम्हे ?
मेरे कोरे प्यार में
विष कहाँ घुल गया पथिक ?
मैंने तो बोना  चाहा था
तुम्हारे आंगन में एक
हरा भरा वृक्ष
जहां तुम शांत विश्राम कर सको
पर तुम कहते हो उसकी छाया
तुम्हे बबूल सी मालूम होती है
हा! पथिक क्षमा
क्षमा पथिक !
अब जान गई हूँ
मेरी आकांक्षाएँ  ही  शायद
इस अंजुरी में भरे फूलों  में
कंटक सी चुभ गई तुम्हें
और घुल गया मेरे प्रेम में स्वार्थ का विष
तभी उग आए हमारे आंगन में
बबूल
और मेरी राह  तकती आँखे तुम्हे
प्रश्न सी खटकने लगीं
पर पथिक , बस इतनी सी विनती है
मुझे मेरी भूल सुधार  लेने दो
बस एक बार फिर मुझे
तुम्हें  अधिकार से निहार लेने दो
बेल सी तुमसे नहीं  लिपटूँगी
वचन देती हूँ
उन्मुक्त तुम्हे तुम्हारे ही आकाश में विचरने दूँगी
और भी मिलेंगे तुम्हे हरे भरे वृक्ष
मुझे न शिकायत होगी
अपने आंचल में तुम्हे नहीं  समेटूंगी
पथिक नही बनूँगी
तुम्हारे पथ की बाधा
बस हाँ
हाँ पथिक केवल पवन सी
रहूँगी  तुम्हारी सहचरी

by me मनीषा

धान सी मैं

आई थी मैं उगने
धान सी
तुम्हारी अनजानी ,अनचीन्ही धरती पर
चाहती थी गहरे पैठ कर तुम्हारे भीतर
अपनी जड़े जमा लेना
पर रिश्तों की  धूप  बहुत प्रखर थी शायद
जो जीवन की  भोर भी
जेठ कि दुपहरी सी प्रतीत होती रही
क्या तुम्हारी प्रीत का
साया झीना था
या मेरी ही जड़े खोखली ?
किससे  पूछूँ  और क्या?
क्या कहीं उत्तर है भी कहीं ?

मनीषा 

रिश्ते

रिश्ते
'गर ये न होते
तो पंछी सा
मन मेरा भी स्वतंत्र होता
अपनी श्रद्धा से
मोती  या कंकर चुनता
काश! ये भूख न होती
प्यास न होती
न होती तड़प  कुछ पाने
और खो देने की
क्या होता जो सिर्फ मैं होती
नर  या नारी
कुछ ना  होती
तब क्या तृप्ति होती ?
By me मनीषा

Saturday, December 21, 2013

अपने प्यार से मुझे बाँधो मत

अपने प्यार से मुझे बाँधो  मत
लौट जाने दो
तुम्हारे शुभ्र उज्ज्वा कांतिमय प्यार की धूप  में
कुछ इस तरह भीग गई हूँ मैं
कि भूल ही जाती हूँ मैं
के तुम्हारे इस बंधन से अलग
मेरा कोई अस्तित्व भी है
इसलिए इससे पहले भूलूँ  मैं
वह जिसे याद करते ही
मेरे पास आ बैठते हैं
क्षोभ , लोभ ग्लानि और विषाद  से घिरे
कुछ खट्ट मिठ्ठे से पल
तुम मुझे लौट जाने दो
वहीं जहाँ  मैं  छोड़ आई हूँ
कुछ रेशम  के धागे
स्नेह भरे दायित्वों  से रंगे
जिन्हे बुन कर ही तैयार करना है
मुझे संसृति से संस्कृति  तक एक सेतु
क्योंकि तुम्हारे प्यार के  इंद्रधनुष के पार भी
 एक  क्षितिज है
जहाँ  कर्म की धरती पर
जीवन तना  सा खड़ा है
मेरा इम्तिहान लेता
एक अनंत रण  का पैगाम लिए
by me मनीषा

Friday, December 20, 2013

पीर

सब कुछ तो है पास तेरे 
सखियाँ कहती है 
दुनिया के सौ सुख 
मन बहलाने को कितने दिलासे 
कुछ मीठे पलों की यादे 
मेरी जायी दो नन्ही मुस्काने
पर जाने कैसी ये हूक अंतर की
कंठ तक उठती नही
हाँ सब कुछ तो है पास मेरे
फिर कैसी ये पीर मेरे
मन में रहती है
by me manisha

Thursday, December 19, 2013

माँ न करना मेरा कन्या दान

माँ  न करना मेरा कन्या दान
मैं तेरी बेटी
तेरी कोख  की जाया
तेरी ही परछाई
जानती हूँ
हूँ मैं बाबा कि दुलारी
पर हर क्षण क्यों  कानों में सीसा  सा  घोलता है
इक तीर सा मन में चुभता है
बेटी तो होती है पराई
जहां जन्मी वो बिछौना  मेरा नही है
तेरे घर का कोई कोना क्यों मेरा नही है
भैया करता है लाड़
पर हर पल होता है अहसास
मेरा इस घर में क्यों अपना कोई नही है
तुम और बाबा बात करते हो
इसे तो अपने  घर ही जाना है
सजन का  घर जा सजाना है
चुटकी भर हल्दी से कर  पीले हाथ
छिन  जाएंगे इस जन्मभूमि से सारे  अधिकार
बाबा कहेंगे अब वो ही घर तेरा है
तुम कहोगी जैसा भी हो निभाना बेटी
बहु  साक्षात् लक्ष्मी बन जाना बेटी
इस द्वार आने के लिए भी सोच विचार करना होगा
जिस ड्योढ़ी पर खेली हूँ
उसका त्याग करना होगा
अगर न लगे वो घर अपना सा भी
तब भी निर्वाह करना होगा
बार बार तिरस्कृति जब भी वहाँ से लौटूंगी
तुम कहोगी तुझ पर मेरा अधिकार नहीं है
यह अब तेरा संसार नही है
लौ जा बेटी सब ठीक हो जाएगा
विश्वास कर इस जग में पूरा सुखी कोई नहीं है
युग युग से हम सब चुप रह कर सहती  आई है
सच मान  बेटी सही व्यवहार यही है
पिया का घर  ही तेरा है
वो माँग  माफ़ी फिर तुझे लिवाने आया है
जा बेटी लज्जित न कर जग में मुझे
अब तेरा निर्वाह वहीं है
माँ  न जन्म देना फिर मुझे
और  इतना ज़रूरी करना हो मेरा गौ सा दान
तब ही देना सुहाग का आशीर्वाद मुझे
'गर दे सको फि घर लौटने का सम्मान मुझे
छिपा कर अपने आँचल  में फिर कर सको दुलार मुझे
दिला सको फिर जीने का अधिकार मुझे
मेरे कतरे पँखो  पर मलहम  रख दे सको उड़ान मुझे
फिर अपने घर के इक हिस्से  में कर सको स्वीकार मुझे
जब कह सको तू मेरी  अपनी है नही है पराई
तब ही देना अपनी कोख पर अधिकार मुझे
माँ मत देना तू तब तक जन्म मुझे
माँ मत देना तू तब तक जन्म मुझे
जब कह सको कि पराया नहीं
आज भी यह घर यह कमरा तेरा है
माँ तब ही करना मान सम्मान से
मेहँदी लगा पिया संग विदा मुझे
पर ना करना  माँ  कभी गौ सा दान मुझे
माँ मत करना मेरा कन्या दान
माँ मत करना मेरा कन्या दान
by me Manisha

टुकड़ा टुकड़ा धूप

टुकड़ा टुकड़ा धूप जब आँगन में आती है 
माँ हर टुकड़े पर रख देती है 
एक एक थाल 
कोई भीगे तिल से भरा 
कोई पापड़, कोई बड़ियों से भरा 
और फिर चुन कर एक टुकड़ा धूप
बैठ जाती है वह स्वयं भी
धीरे धीरे उसके हाथ बुनते हैं
नरम नरम ऊनी स्वेटर
कभी छज्जे पर खुल के आती धूप में
वो फैला देती है निचोड़ कर कपड़े
और किसी पुरानी सूती धोती से
ढक कर रख देती है
ताज़ी तोड़ी सेवइयां
एक समय था जब माँ को
धूप बटोरनी नहीं पड़ती थी
खुले आँगन में धूप नाचती फिरती थी
तब हमे धूप में लिटा कर माँ
धीमी धीमी बहती धार में
कपड़े धोया करती थी
फिर पता नहीं कब हम बड़े हो गए
इसने कि धूप भरा आँगन छोटा पड़ गया
अपने आँगन से , नन्हे से आँगन आँगन से
निकल भागे स्कूलों , कॉलेजों , दफतरों की ओर
और ना जाने कहाँ से उग आईं हमारे आंगन
के चारों तरफ
आकाश छूने को कसमसाती ये बिल्डिंगे
धूप अब किसी छिद्र से झाँकते
आकाश के टुकड़े से टपक भर पड़ती है आँगन में
और माँ अपने खटोले पर बैठे बैठे
ऊन के फंदों के बीच
टुकड़ा टुकड़ा धूप चुनती रहती है
कभी गीले कपड़ों के लिए
कभी आचार के लिए
कभी बड़ियों तो कभी पापड़ के लिए
वह सेंकती रहती है
उम्र से पके अपने बाल और कुम्हलाती देह
उस टुकड़ा टुकड़ा धूप से
जो अब आंगन में टपक भर पड़ती है

by me मनीषा
read this in a kavi sammelan long back and it was much appreciated by everyone

स्मृति

जाऊँगी दूर कहीं लौट कभी क्या पाऊँगी
चाहो तो पास तुम्हारेएक ख्वाब  सी रह जाऊँगी
ढूंढोगे तुम कभी और पुकारोगे मुझे तब
इन तारों भरे अम्बर में इक तारा बन छिप जाऊँगी
किसी दिन इक झोंके सी
हवा में महक सी छिप तुम्हें  छू जाऊँगी
कहीं बैठ जब ऊषा सुनहरे केश लहराएगी
सूरज की लाली बन तुम्हारे मृदु अधरों पर छा  जाऊँगी
बैठे होगे  जब  एकाकी तुम इक  साँझ किसी झूले पर
छज्जे पर गाती  चिड़िया के स्वर में सुर मिलाऊँगी
जब जगती में जीवन संचरित होगा
तुम्हारे मन के भावों में कल्पना सी लहराऊँगी
तुम्हारे कमरे की  खिड़की के सामने
तरु शिखा पर खेलती किरणों  सी
तुम्हारी निगाहों में उतर मुस्काऊँगी
ना लौट सकूं कभी इस देह व्यूह चक्र में
तो भी यूँ  ही सी इक मृदु  स्मृति बन
तुम्हारी आँखों के गीले कोरो में मुस्काऊँगी मैं

मनीषा 

Monday, December 16, 2013

एक स्याह रात

मेरे भीतर एक स्याह रात पलती  है
तू अपनी दस्तकों से इसमें उजाले न भर
मुझे इन वीरानियों की एक आदत सी है
तू अपनी बगिया के इसमें फूल मत भर
मैं रोज़ सूरज सी उगती हूँ ,मरती हूँ कभी
तू मेरे लिए अपनी आँख के कोरे नम मत कर
सपने सा है तेरा आना मेरी दुनिया में
प्यार करता है तो कर पर इज़हार ना कर 

एक किरण

एक किरण रौशनी की 
भटक कर भीतर आ गई थी
मैंने सांकल तो कस के लगाई थी
फिर भी बिना आहट
वो चुपचाप चली आई थी
हल्के से मुझे छू  के बोली
तू मुस्कुरा मैं तेरे लिए आई हूँ
तेरे आंसू आसमाँ  ने गिने है
और कुछ तेरे लिए मोती  चुने हैं

लेकिन पराया था वो अहसास
मेरे भीतर तो सिर्फ तन्हा पन्ने रखे  थे
उसके उजास से डर  गई मैं
इतनी अजनबी थी ख़ुशी कि
इक पल के लिए मर कर जी उठी मैं
 फिर मैंने उसे धीरे से बाहर धकेला
उसकी यादों को एक एक कर उधेड़ा
और
अपने अंधेरो में फिर मस्त हो गई मैं
मनीषा 

Sunday, December 15, 2013

एक फरियाद

फिर पुकार मुझे
चुपके से  ले  मेरा नाम
डूब रही हूँ अपने ही मन के अंधेरों में
अपनी लौ से कर दे रौशन मुझे

बहुत झूठ जी चुकी हूँ
आज तेरे सच में जीने का हौसला हुआ है
तेरी बाँहो  के लिए तड़पी हूँ बेइंतहा
अपने आगोश में छिपा ले मुझे

तेरा साथ तो एक ख्वाब सा है
जानती हूँ फिर भी
मेरे ख्यालो में गुम हो जा और
अपने ख्वाबों में बसा ले मुझे 

Thursday, December 5, 2013

मन मीत

हुए  पथ अलग
अब चलती हूँ मन मीत
है पथ पथरीला
कुछ तुम्हारा
कुछ मेरा
फिर भी चलो
अपने अपने पथ पर
चलते हैं मनमीत
मुझे थामनी है
अपने इस रथ की कमान
तुम सम्भालो अपनी गांडीव
चलो चलते हैं
अपने अपने प्रशस्त पथ पर
हम और तुम मनमीत
तुम करो कर्त्तव्य पालन
मैं करती हूँ सप्तपदी के वचन पालन
अब बिछड़े
न जाने कब फिर ये पथ  मिलेंगे
चलो चलती हूँ मनमीत
मनीषा
शादी की  सालगिरह पर 

प्रभात

जाड़ो की नरम रज़ाई
और अलसाई सी एक अँगड़ाई
हाथों में गर्म चाय का प्याला
और पांव के  तलवे सहलाती नरम धूप
 ज़हन में तुम्हारा ख्याल
और नज़र में उतरता
आज का अखबार
बस इतनी सी कहानी में
बीत गई एक और खुशनुमा प्रभात
मनीषा 

Saturday, November 23, 2013

आदत

तेरे आँगन की छाँव  नहीं सहन होती
मुझे धूप की तपिश की  आदत सी  हो गई है

कुछ टूटा सा था तो
मन के आगे कुछ सलाखें सी बो दी थी
कुछ मौसम पहले
इन बरसातों में पहरों  की उसे आदत सी हो गई है

अब मत खटखटाना मेरा द्वार
मत पुकारना मुझे
अपने भावुक बोलों से
मुझे सन्नाटों कि आदत सी हो गई है

बहुत दूर निकल आई हूँ इन राहों में
अकेले चलते चलते
अब तेरी आदत कुछ छूट सी गई है

बड़ी देर से आए हैं
वो सुलझाने बिगड़ी बात
अब तो इस दर्द की आदत सी हो गई

मन पर लगी  सांकल है
बहुत भारी
अब किवाड़ खोलने में डर  लगता है
इन दस्तकों की आवाज़ से काँप  जाती हूँ
तन्हाईयों  कि आदत सी हो गई है
मनीषा

Friday, November 22, 2013

व्यवहार

कैसे बिसरा दूँ
जो थी आप बीती पुरानी
नए छोर को कैसे पकडूँ
कैसे लिखूँ  फिर से
रिश्तों की  पुन: कहानी
अश्रु भरे नयनों  से
बह चुका  जो विश्वास
फिर से कैसे ह्रदय में
बसा लूँ क्षण में
प्यार की थी
एक कोमल सी डोर
अब बिन गांठ कैसे उसे जोडूं
नही मिलता है
अब वो भोला विश्वास
अनुभव कि चिता पर
होम हुआ वह कोमल अहसास
अब लाऊं कहाँ से वो पहले सा प्यार विश्वास
जब चुक चुका सारा व्यवहार 

Thursday, November 7, 2013

शब्द

जीवन के ताने बाने को
मन भावुक उतारता जाता है
शब्दों में
पर फिर भी इन तालों में
बांध कहाँ पाता  है
हर उदगार
पीड़ा में
प्रीती में
दे देते शब्द
एक आधार
लेखनी में उतर जाता
विषम जीवन का संग्राम
मनीषा 

Wednesday, November 6, 2013

दीपमाला

स्नेह भरे दीप
कितनी आशा भरे
इस दीपमाला में
जाने कितने अश्रु जले
धूमिल निशा हारी  सी
उज्ज्वल ज्योति से भरी
नभ तक सीमिति
धरती पर उमंग भरा
उजास उदित है
दुःख कोने कोने में छिपता फिरे
बस एक इस रात
सुख कामना का वास भरे
हर मन खिले
घर घर स्वागत दीप जले
मनीषा

Saturday, October 26, 2013

पापा

पापा सिर्फ पापा नहीं होते
मन का संबल हैं होते
मुश्किलों में बढ़ कर थाम  लेने वाले होते है
वो हाथ
गोदी में चढ़ गरदन पर झूल जाने वाला होते हैं दुलार
नज़र नहीं आए हैं अब वो कहीं इस जहां में
पर अब भी रूह में समय हुआ होते है वो विश्वास
अपने अंश में ढूँढा
तो मिल गए उनमे रचे  हुए वो ही हाथ

Thursday, August 8, 2013

सियासत

वो सियासत करते रहे 
घर के खंडहर सुलगते रहे
खींच तान कुर्सी की चलती रही 
लाशों के पाए गढ़ते रहे 
चूड़ियाँ कुंवारी कन्याओं की 
नेताओं की कलाईयों पर खनकती रही 
माँए  लोरियां गुनगुनाती रही 
बच्चे भूख से बिलखते रहे 
कूड़े के ढेर पर बसा है 
ये शहर सारा 
गली के बाहर कुत्ते भूंकते रहे 
रात भर यूंही जलसे चलते रहे 
करवटे बदलते रहे आप 
जिस्म पर कोड़ो  के निशान उबलते रहे 
सियासतदाहों   की मजलिस में 
क्यों फर्क पड़े 
वो वोट गिनते रहे 
हम  वोट देते रहे 
 -
मनीषा 

Tuesday, June 25, 2013

केदारनाथ जून 2013

ना आता है गुस्सा
ना ही आंसू फूटते हैं
नि:स्तब्ध देखती हूँ
ईश्वर के द्वार  पर 
जलती चिताओं पर 
सत्ता की रोटी पकते 
क्या कहूं क्या लिखूं 
मन का चीत्कार
उस ईश्वर से भी क्या कहूं
जो आज मूक है 
हर तरफ हा हा कार मचाकर   



 

Monday, June 10, 2013

कभी मान भी अपमान सा लगता है

कभी मान भी अपमान सा लगता है 
घर की बेटी होना भी अपराध सा लगता है 
उन संस्कारों पर प्रश्नचिंह सा लगता है 
जब अपना आप भी पराया सा लगता है 
परम्परा की वेदी पर बलि सा अपना आप लगता है 
मनघट पर हर कदम दायरा सा लगता है
मनीषा

Sunday, June 9, 2013

मन में दर्द की गठरी लिए

मन में 
दर्द की गठरी लिए 
जाने कब तक जीना 
इस जीवन का बोझ
न जाने कब तक है ढोना 
नित उठ कर बस 
उसांस भर 
कर्म के क्रम में न जाने 
कब तक है जुटना 
न जाने कब तक है जीना 
इस पार तो दायित्व है
कर्म का पुलिंदा हैउस पार न जानेकितना है कॊई अकेलाहम तो रो लेते हैंचुपचाप चुपचापकह सुन लेते हैंइक दूजे से भी मन की बातउस काल परदे के पीछे सेक्या जाने वो भी देते हों हमें आवाज़बिन मीतन जाने कब तक और है जीनाइस जीवन की गठरी कोकब तक है ढोनामनीषा

लौटी हूँ बरसों में

लौटी हूँ बरसों में 
फिर रिश्तो के ताने बाने 
गुथने होंगे 
मन के दायरे
फिर बुनने होंगे 

Friday, June 7, 2013

एक सोच :क्या फर्क पड़ता है

हम जाते हैं 
अफ़सोस जताने और करते है 
बहुत वाद विवाद उस पर जो 
जाने क्यों ज़रूरी है 

"चूड़ियाँ तोड़ दो 
बिछिये उतार दो 
बिंदी सिन्दूर मिटा दो 
चूल्हा मत जलाना 
बेटी से मत उठवाना 
जिस रस्ते गए थे 
उस रस्ते मत आना 
कपड़ा  मत धोना 
नया मत पहनना 
यह मत खाना 
अरे तुम  मत पकाना "

क्या फर्क पड़ता है 
इस  सब से 
क्या जाने वाला लौट आता है ?
मृत्यु हार जाती है जीवन से ?
इतने नियमों के पालन से 
संस्कारों को जीने मरने का प्रश्न मत बनाओ 
केवल उत्तरदायित्व निभाओ 


किस वेद  में लिखा है 
किस उपनिषद में 
मन को दुखाना उचित है?
फिर भी हम निभाते जाते है 
जाने किस मोक्ष के भ्रम में 
करते जाते हैं अनाचार 
वाद विवाद 
उस पर जो शायद अब सिर्फ रूढी  है 

बस करो , मन दुखता है ...
करो सिर्फ उतना जो ज़रूरी है 
एक नया जीवन 
जीने के लिए 
मनीषा 

Thursday, June 6, 2013

शब्द कितने अर्थहीन

शब्द कितने अर्थहीन
हारते जाना पल पल
इस  समय चक्र में
शब्द मय  भुलावे सभी
व्यर्थ का अदान प्रदान
दिलासे सभी
अश्रु पूरित चेहरों को लौटा नही
पाते फिर वही हँसी वही ख़ुशी
जीवन अंत या अनंत
शब्दों में बंधा एक प्रश्न चिन्ह
निरूत्तर सा सुबह शाम मन को घेरता सा

शब्द कोष वेद  उपनिषद
खंगाल डाले सभी
रीती -रिवाजों के बन्धन
भी डाले सभी
पर कहाँ मिलता है
उत्तर कहीं
मानो  तो सब है उस पार
न मानो  तो कुछ नहीं
अग्नि जल वायु आकाश धरा
सब खोजा बहुत पुकारा भी
मिलता है तो सिर्फ छलावा
एक भुलावा
जीने का बहाना
जीवन  में बस चलते जाना
अपने  पथ पर ढलते जाना
श्वास रुकने तक बस
उत्तर खोजते जाना


मनीषा 

Monday, March 4, 2013

एक ख़त लिखूँ

एक ख़त लिखूँ 
उसके नाम 
जो कभी पढ़ता  नहीं 
मेरे मन की बात
उसके लिए लिख रखूँ 
मैं हर वो बात 
जो वो सुनता नहीं 
लिख डालूँ हर वो 
बात बेबात 
मेरे दिन और रात 
जीवन की कदम ताल 
सांसों  की बारात 
एक एक पल की बात 
लिखूँ  उस चाँद की बात 
देखता है जो हमे 
अलग अलग 
हर रात 
लिखूं कैसे उस बिन 
आई रोज़ सुबह 
और कैसे हर घड़ी आई
 मुझे उसकी याद 
लिख दूँ उसे सब 
दिळ  की बात 
कैसे गुज़रे उसके  बिन 
ये दिन और साल 
जो सुनता नही 
अब मेरे क़दमों की थाप 
मनीषा 


Wednesday, February 27, 2013

याद है मुझे आज भी

याद है मुझे आज भी 
रात  में तुम्हे जान तकिये से यूं लिपटना मेरा 
वह  किसी और शख्स में तुम्हे देख ठिठकना मेरा 
कभी तुम्हारे ख्यालो में भटक मुस्कुराना मेरा 
और तुम्हारे खत को किताबो के बीच रख  पढना मेरा 

अक्सर तुम्हे याद कर और तन्हा हो जाना मेरा 
फिर दिल को बहला फुसला महफ़िल में खिलखिलाना मेरा 
हर सुबह डाकिए की राह  निहारना मेरा 
और हर शाम के साथ मायूस हो जाना मेरा 

तेरी जुदाई को इम्तिहान समझ सहना  मेरा 
उस  दर्द में भी वो सहेलियों संग मुस्काना मेरा 
कभी तनहा तनहा आँसू  बहाना मेरा 
कभी हर आहट  पर वो आँखों के अश्क छुपाना मेरा 

तेरे आने की खबर पर वो इतराना मेरा 
इन कदमो का थिरकना  वो हाथों का कांप  जाना मेरा 
तुमसे मिलने के लिए वो बहाने से घर से निकलना मेरा  
और तुम्हे सामने पा  वो रो पड़ना मेरा

मनीषा 

तुमने अंकित कर दिए शब्द

कितनी सरलता से तुमने 
अंकित कर दिए  शब्द 
और घुमड़ते भावों को दे दिया 
एक निश्चित आयाम 
एक कोरे कागज़ पर लिख दिया
 इस रिश्ते का नाम और अंजाम 
पर क्या यह  काफी है 
उन सभी मूक अभिव्यक्तियों 
को व्यक्त करने के लिए 
क्या मन के भाव बंधन में बंधे रह जाएँगे 
या व्यक्त हो उन्मुक्त हो जाएँगे 
शब्दमय अभिव्यक्ति केवल क्षणिक सुख देती  है 
अनकहे विचार मन में ज्वर भाटे से मचलते हैं 
मन के साहिल को कचोटते काटते 

क्या मैं इन शब्द सेतू के पार 
जान पाऊंगी  तुम्हे 
या तुम इन शब्दों की परम्परा से मुक्त हो 
पारदर्शी हो पाओगे
 शब्द सतही हैं 
कोरे अक्षर पंगु से सिर्फ 
रिश्तो के दायरे मापते हुए 

तुम और मैं 
इन  पूर्व निर्मित वाक्यों में उलझे 
मिल नहीं पाते , कहीं  गुम हो जाते है अर्थों  की सूची में 
फिर  सप्तपदी के इन वचनों को 
मैं क्यों यूं ही  मान लूं 
मैं क्यों और कैसे विश्वास  करूं 
और तुम भी क्यों स्वीकार करो 
इन भाव विहीन शब्दों में स्पष्ट होते अर्थ 

क्यों न तुम और मैं 
सिर्फ मूक भावों का ही सम्प्रेषण करें 
और मान ले शब्दोंकी असक्षमता को 
जो आज इस क्षण से पूर्व 
और इस क्षण के बाद 
या इस क्षण में भी 
हमारे बंधन को समेट  नहीं पाएंगे 
अपनी सीमित सार्थकता में 

एक बार फिर से पहचान करें 
मन से मन की बात करे 
कुछ तुम मेरी अनकही सुनो 
कुछ मैं तुम्हारी आप बीती सुनूँ 
फिर से वो पहली मुलाकात करें 
चलो शब्दों वाक्यों विधानों से परे 
आँखों की आँखों से  बात करें 

मनीषा 


Monday, February 25, 2013

मेरे गीत भी मुस्कुराते हैं

ज़िन्दगी की संकरी गलियों में 
कुछ रिश्ते अनायास ही आँचल से लिपट जाते हैं 
और मेरी तन्हाई कुछ अकेली हो जाती है 
मन को छूते हैं कुछ पल  हौले हौले से 
और एक  सुबह निखरी निखरी धूप  
मेरे कंधो पर रख देती है हाथ 
कितना सुखद होता है 
कभी अपने ही अतीत से मिलना 
अपने बचपन में लौटना 
जब मिलते हैं मीत पुराने 
मुझे मेरी याद दिलाते हैं 
और मेरे गीत  भी मुस्कुराते हैं 

Tuesday, February 19, 2013

रस्ते पर चलती लोगों की भीड़


रस्ते  पर चलती लोगों की भीड़ 
और भीड़ के बीच पसरे दो हाथ नन्हे काले भद्दे हाथ 
हाथों पर  नाखून चटक कर काले पड़  चुके हैं 
और हथेलियों पर बिखरी पड़ी है 
परत दर परत गर्द 
हाथ पसरते ही रहते हैं  
हर तेज़ कदम की धमक के आगे 
उन हाथों पर रखी  है 
एक बेचारी सी खामोश आवाज़
 जिसकी उम्मीदगी में  झलकती है 
एक अठन्नी की खनक 
भीड़ के आगे फैले हाथ फैलते ही चले जाते हैं 
लाचारी भरी मासूम आंखे देखती रहती हैं 
और भीड़ गुम  होती जाती है 
न जाने कहाँ से कहाँ तक आती है जाती है हर रोज़ 
अब भीड़ में चेहरे नज़र नहीं  आते 
बस आता है नज़र तो बस उस भीड़ के हिस्से बने लोग 
और उनके आगे दया याचना करते  
दो जोड़ पसरे हाथ 
हर तरफ बस सिक्कों की खनक ढूंढते 
हाथ ही हाथ 
भीड़ सिक्के खनकाती कहीं गुम  हो जाती है 
उसे रुकना ठिठकना मंज़ूर न हो जैसे 
रह जाती है तो मन मसोसे 
कूड़े के ढेर में पत्तलें ढूंढते दो  हाथ 
और गर्द फांकती  प्रश्नभरी दो आँखे 
मनीषा 



जब जब उतरती है

जब जब उतरती है 
       वसुधा  के अंचल पर रात नई 
मन को आलोड़ित  करती है 
       फिर फिर बात वही 
यूँ तो समय ने कितनी देखी  होगी 
        रातें नई  नवेली 
पर रुक था क्षण भर काल भी 
        देख वो छवि सलोनी 
मिलन था वो पल या बिछोह की थी राह बनी 
        जब नैनो की नैनो से थी तकरार हुई 
मन आज भी उसांस  भर रह जाता है 
        सोचता है बावरा 
 उन नैनो में थी भी या नहीं बात कोई 
मनीषा 

Sunday, February 17, 2013

वक्त की कलम से

वक्त की कलम 
से ज़िन्दगी के पन्नों पर 
अक्षर अक्षर बिखरती रही मैं 
कभी जीती कभी थोड़ा मरती रही मैं 
बहुत सोचा सब पा लेना मेरे बस में है 
नियति से भिड़ती लडती रही मैं 
तुझे जीतने को 
हर कदम पर खुद को हारती रही मैं 
कभी चुप रही 
कभी बोली भी , तुझसे मन का भेद छुपाती रही मैं 
बहुत टूटी बहुत  बिखरी 
फिर भी तेरे लिए हँसती  मुस्कुराती रही मैं 
मुझे ढूंढना मेरे गीतों में 
तेरे लिए जिंदगी भर गाती रही मैं 
मनीषा 

Wednesday, February 6, 2013

शब्दों का नाता तो रहने दो

शब्दों का नाता तो रहने दो, एक छलावा तो रहने दो 
वेदना से मेरी, भीगी होंगी तुम्हारी भी आँखे 
आछन्न मन से फूटी होंगी बोझल आहें 
मौन एक दिलासा तो रहने दो 

जब भी अश्रु छलकाने को कान्धा  तलाशेंगी मेरी आँखे 
जीवन के समर में  खंड खंड हो जाएँगी  मेरी पाँखे  
बनकर आधार थाम लोगे मुझे तुम 
एक नन्ही सी आशा तो रहने दो 
शब्दों का नाता तो रहने दो, एक छलावा तो रहने दो 

फिर इसी मोड़ पर प्रतीक्षारत तुम्हे पाऊँगी  मैं 
दूर हो कर भी तुमसे तुम तक फिर लौट पाऊंगी मैं 
हर राह पर मेरी मंजिल से होगे तुम 
एक चुप सा विश्वास  तो रहने दो 
शब्दों का नाता तो रहने दो, एक छलावा तो रहने दो 

जिनके अपने हैं जग में उन्हें कटु सत्यों से भय कब लगा 
मेरे लिए तो बस यह भुलावा ही जीने का बहाना हुआ 
सांसों का तारतम्य तो रहने दो 
बोल चालों  में अपनत्व की परिभाषा तो रहने दो 
शब्दों का नाता तो रहने दो, एक छलावा तो रहने दो 
मनीषा 


Wednesday, January 30, 2013

मुझे गाँधी दिखता है




मुझे गाँधी दिखता  है 
चौराहों पर मूर्तिवत 
पुस्तकों  में छपा 
स्कूल की दीवारों पर चित्रित 
कभी कभी सभागारों में 
मैं उसे संसद की दीवारों पर भी 
देखती हूँ 
उसके उजले कपड़े  
कुछ काले दिलों पर भी चढ़े देखती हूँ 
उसकी टोपी सार्वजनिक हो गई है 
मैं देखती हूँ अब आम हो गई है 
दिल्ली में एक मैदान है उसके नाम 
हर शहर में एक सड़क  मिलती है गाँधी के नाम 
राजघाट पर भजनों  के बीच उसे श्रद्धांजली  चढ़ाते  हैं 
उसे भारतीय कह लोग गौरान्वित होते हैं 
देखती हूँ मैं उसे, और सोचती हूँ
वो  फ़क़ीर,  जो हर नोट पर छपा मिलता है 
उसे कहाँ ढूंढू , वो जीवन में कहाँ उतरता है 
गाँधी अब सिर्फ मिसालों  में सिमटा मिलता है 
भाषणों में कहा मिलता है 
अब गाँधी सिर्फ चौराहों पर सजा मिलता है 
साल में दो बार कलेंडर की 
तिथियों में छिपा मिलता है 

मनीषा 


चलो पुण्य तिथि है आज

चलो पुण्य  तिथि है आज , आज आँखे कुछ नम कर लें 
कोई था गाँधी भी आज याद कर लें 
त्यौहार सा मन है , आखिर छुट्टी है बहुत फुर्सत है 
चलो आज फिर  बापू को याद कर लें 
आज आँखे कुछ नम कर लें 

बहुत जलाई बसें , पुतले फूँके 
बहुत तोड़े हैं कारों  के शीशे
खाया बहुत जी भर  फाइलों  के भीतर 
आज मन को  कुछ शुद्ध कर लें 
चलो आज आँखे कुछ नम कर लें 
चलो फिर बापू को याद कर लें 

कहाँ पड़ा है वो खद्दर का चोला 
जाने कहाँ रख दी है वो उजली टोपी
सत्य के प्रयोग रखें हैं धूल  में दबे 
चलो पुरानी  अल्मारी  साफ़ कर लें
चलो आज आँखे कुछ नम कर लें 
चलो फिर बापू को याद कर लें 

बच्चो का मन है घूमने का 
राजघाट ही जाया जाए 
कोई था गाँधी , सादा, सरल 
धरती पर जन्मा एक देवता 
उन्हें भी बतलाया जाए 
चलो आज आँखे कुछ नम कर लें 
चलो फिर बापू को याद कर लें 

संकल्प लिया था बापू ने 
सत्य का अहिंसा का निर्वस्त्र रहने का 
जब तक एक तन भी भारत में नग्न रहे 
उसे भी याद कर लें 
शापिंग मॉल  के बाहर 
खड़े भारत को भी नमस्कार कर लें 
चलो आज आँखे कुछ नम कर लें 
चलो फिर बापू को याद कर लें 

मनीषा 

Monday, January 28, 2013

ये रातें हैं

ये रातें हैं मेरी सिर्फ मेरी 
मेरे संग मुस्कुराती हैं गाती  हैं 
और कभी रो देती हैं 
बाँटा  है मने खुद को , हाँ खुद को 
और तुम्हे , इन रातों के साथ 
जब पूर्व में उषा झाँकती  है 
मैं विभाजित हो जाती हूँ 
तुमसे, और  स्वयं  में  विभाजित 
इन रातों में ही तो मेरी और तुम्हारी पूर्णता है 
इनमे मैं स्वयमाब्द्ध हूँ -सम्पूर्ण 
कभी कभी इन अंतहीन रातों में 
सपने मुझसे मिलने आते हैं 
और भोर की  उजियाली  के संग 
ताश से बिखर जाते हैं 
मेरी इच्छा सी ही ये रातें 
ढल जाती हैं 
कभी मुझे थपकी दे सुलाती हैं 
कभी भोर तक बतियाती हैं 
और कभी मेरी ही सुनती हैं 
और मुझे सुनाती हैं 
इनके साथ बाँटती  हूँ मैं 
तुम्हे और खुद को 
तुम इन्हें नहीं जानते क्योंकि 
उजालों के अनुगामी तुम 
निंद्रा में खो जाते हो 
पर ये तुम से परिचित हैं 
तुम्हारे स्वर से परिचित हैं 
ये मुझे सुनती हैं 
मन गुनती हूँ संग  इनके 
कुछ अधूरे से रंगीन सपने 
इन रातों के साथ  मैं उगती हूँ 
सुबह तक ढल जाती हूँ 
आंसूओ में डूबी , खिलखिलाहटों से भरी 
गम्भीर सी, मैं स्वर मिश्रित कली  सुन्दर रातों में 
रोज दिन बीतते 
मैं चाँदनी  सी खिलती हूँ 
क्योंकि ये ही तो 
सुख सुख की साथी 
मेरी अभिन्न सखियाँ हैं 
मैं पाती  हूँ अपना आप  इनके  अंधेरों में 
और हर सुबह जग में  विलुप्त हो  जाती हूँ 

मनीषा 

Saturday, January 26, 2013

गुज़र जाते हैं

गुज़र जाते हैं हमारे बीच कितने 
अनकहे दिन अनकही  रातें 
कहो कब ख़त्म होंगी दीवारों से बातें 
नयन जब भी पा  जाते कुछ ऐसा 
जो हर्षित तुमको भी किया करता 
मन मचल जाता वहीं से 
तुमको पास बुलाने को 

पाँव   थम  जाते पर वहीँ कहीं 
बोल होंठो के कोरो पर ही घुट जाते 
प्यार कहीं गुम  हो जाता है 
जब 
यह क्रूर अहम  बीच  आ जाता है 
पहले तुम, के ख्याल में 
जीवन का मृदु क्षण गुम जाता है 

कितनी बीतीं स्मृतियाँ अतीत के 
पुलिंदों  में दफ़न  हुईं 
कितनी सूनी रातें सपनीली बातें 
सिर्फ करवटों में गुज़र गईं 
अब एक लम्बी सुनहली धूप चुराने का 
मन करता है 
चुटकी भर चाँदनी  बिखराने  का 
मन करता है 
शाम की इन उदास क्यारियों में 
एक नन्हा सुख उगाने का
 मन करता है 
आज फिर संग तुम्हारा पाने का 
मन करता है 

मनीषा 

Wednesday, January 23, 2013

रोज़ आती है एक रात मेरे मन में

रोज़ आती है एक रात मेरे मन में 
रोज़ उसे सूरज से तेरे भगाती हूँ 
रोज़ मन करता है मर जाने का 
रोज़ तेरे नाम पर जी जाती हूँ 

बहुत अँधेरा है यहाँ 
रौशनी तक कहीं  नज़र नही आती 
इतनी दूरियाँ  हैं 
सालों  की मजबूरियाँ हैं
 बीच में तेरे मेरे 
वक्त का एक दरिया है 
आँख मूँद भी लूँ  मैं तो भी 
मन के भीतर 
अब तेरी सूरत तक नज़र नही आती