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Saturday, November 23, 2013

आदत

तेरे आँगन की छाँव  नहीं सहन होती
मुझे धूप की तपिश की  आदत सी  हो गई है

कुछ टूटा सा था तो
मन के आगे कुछ सलाखें सी बो दी थी
कुछ मौसम पहले
इन बरसातों में पहरों  की उसे आदत सी हो गई है

अब मत खटखटाना मेरा द्वार
मत पुकारना मुझे
अपने भावुक बोलों से
मुझे सन्नाटों कि आदत सी हो गई है

बहुत दूर निकल आई हूँ इन राहों में
अकेले चलते चलते
अब तेरी आदत कुछ छूट सी गई है

बड़ी देर से आए हैं
वो सुलझाने बिगड़ी बात
अब तो इस दर्द की आदत सी हो गई

मन पर लगी  सांकल है
बहुत भारी
अब किवाड़ खोलने में डर  लगता है
इन दस्तकों की आवाज़ से काँप  जाती हूँ
तन्हाईयों  कि आदत सी हो गई है
मनीषा

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