Pages

Sunday, December 29, 2013

मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले

मैंने तो  चलना ही था इस डगर पर अकेले ही
तुमने क्योंकर पुकार लिया यूँही
किसी अतीत के कोने से आकर दे दी दस्तक
मेरे मन के अंधेरो पर अपने उजालों  की

मेरे बिखरे मन को तुम आज क्यों समेटना चाहते हो
अपने वक्ष में क्यों मेरा वजूद बसाना चाहते हो
क्यों जकड़ना चाहते हो मुझे अपने बाज़ुओं में
मैं तो रो ही रही थी बरसों से हर बरसात में
तुम किसलिए  अब मुझे अपना कांधा  देना चाहते हो
ओ! आनेवाले अजनबी तुम क्यों मुझसे परिचित होना चाहते हो
मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले
तुम क्यों मेरा साथ देना चाहते हो

लौट जाओ ,
यहाँ बहुत कंटक है मन के भीतर
इनमे कैसे फूल खिलेंगे
मन में जो अब संवरते नही उन बेरंग मौसमों में कैसे रंग भरेंगे
तुम  थाम  तो रहे हो मेरा हाथ हम कैसे संग चलेंगे
तुम्हारे रास्तों पर फुलवारियां है
मेरे रास्ते बीहड़ो की ओर जातें  हैं
तुम लौट जाओ यहीं से
मेरे पास पाने को कुछ भी नही है
और तुम्हारे पास खोने को है बहुत कुछ
मुझे तो चलना ही है इस डगर पर अकेले
मनीषा

Saturday, December 28, 2013

मैंने तुमसे मोती पाए

मैंने तुमसे मोती  पाए
जीवन के इस संघर्ष में
रहे तुम एक सहज दिलासा
मैंने तुमसे मोती पाए
जब जब मुझे तम ने घेरा
तुमने मेरे पथ पर बिखेरा उजेला
मैंने तुमसे मोती  पाए
थक कर चूर हो गई जब पाँखे
तुमने मेरे लिए आसमां झुकाए
मैंने तुमसे मोती  पाए
बहुत  दुर्गम  थी मेरी राहें
तुमने मेरे हर पग मेरे छाले सहलाए
मैंने तुमसे मोती  पाए
हमकदम कैसे कहूँ  तम्हे
चलना तो था मुझे ही अकेले
पर तुमने मेरे सन्नाटे बुझाए
मैंने तुमसे मोती  पाए
मनीषा 

जन्मों का रिश्ता

सात फेरे और बस
बीते बीस साल
का जीवन नगण्य
ॐ भूर्भव: स्व:
की  ध्वनि के साथ
हवन कुंड कीअग्नि में स्वाहा
कितना असत्य है यह
या कितना सत्य था वह
कहते हैं सर्व त्याग दो
तन से , मन से , धन से सम्पर्ण
देहरी लाँघ बन जाना मर्यादा सबकी
बेटी से बहु
कन्या से ब्याहता
इक रात का सफर
और जन्मों  का रिश्ता
क्षण  में बंध गया
और एक कागज़ से टूट गया
कैसा नाता है यह ?
मानो तो सबकुछ
न मानो तो कुछ नहीं …
मनीषा 

Friday, December 27, 2013

मन करता है

गुज़र जाते हैं हमारे बीच कितने
अनकहे  दिन अनकही  रातें
कहो कब खत्म होंगी दीवारों से बाते
नयन जब भी पा जाते कुछ ऐसा
जो हर्षित तुमको भी किया करता
मन मचल जाता वहीं कहीं
तुमको पास बुलाने को
कितनी संचित स्मृतियाँ
अतीत के पुलिंदों  में दफन हुईं
कितनी सूनी रातें सपनीली बातें
सिर्फ करवटों में गुज़र गईं
अब एक
लम्बी सुनहली धूप चुराने को मन करता है
थोड़ी चाँदनी  छिटकाने को मन करता है
शाम की इन उदास क्यारियों में
एक नन्हा सुख उगाने को मन करता है
आज संग तुम्हारा पाने को मन करता है

by me मनीषा

टूटन

कच्च  से टूटा है कुछ
पर क्या?
सपना?
सपनों  के टूटने की आवाज़ नहीं  होती
कभी ध्यान से सुनो तो
सुनाई देती है सिर्फ
एक धीमी सी सिसकी
खिलखिलाते होंठों  के बीच दबी
देखो गौर से
तो शायद चमक जाएँ
पलकों के भीतर सूखे आँसू
और जानो तो
उस मस्त चेहरे पर नज़र आ जाएँगी
दर्द की गहरी लकीरें
उस हंसते चेहरे पर खिलते चुटकुलों के बीच
खाली सूनी गहरी आँखे
उसके अंतर का परिचय भी दे जाएँगी
और किसी सपने की ताज़ी लाश
अपना अक्स दिखा देगी
आँखों के नीचे पड़े काले गहरे गड्ढों में

by me मनीषा

चूड़ियाँ

साथ चाहिए तुम्हारा
इन्हीं  चूड़ियों सा
जो संग रहें  तो खनकती हैं
उतरें तो मौल  जाती हैं
जब सजती हैं किसी कलाई पर
तो सूनापन  ढाँप  देती हैं
और कोरे हाथ खिल उठते हैं
हास्य परिहास से
साथ चाहिए तुंम्हारा
इन्हीं चूड़ियों सा
by me मनीषा 

सौंपती हूँ स्वयं को

ले आई थी कभी मैं भी माणिक पुष्प भर
इस मानस  घट से
और तुमने लौटा दिया था द्वार से
मेरा धरा बन  जाना ही यदि  तुम्हारे
अधरों पर मृदु हास का उजास बिखेर सकता है
तो अब धूमिल हो जाना ही मेरी साध है
लो आज सूत्र नही सौंपती हूँ स्वयं  को
उस सूखी ज़मीन के रूप में
जिस पर तुम बिखर सको टूटे कांच से

मनीषा 

अनकही

एक अधूरी  कहानी
कुछ चुप से शब्द
छतें टापती  वो बातूनी आँखों
शरमा  कर झुकती  पलकें
और चहचहाते पक्षियों के पंखो के नीचे
फागुनी मौसम की अंगड़ाई में
कपकपाती अँगुलियों के पोरों  को  महसूस
करते दो हाथ
और अनजाने डर  का  वो नाज़ुक सा स्पंदन
बस यही तो
इतनी सी कहानी है
अनकही  अनबूझी पहेली सी
ज़िंदगी की

by me मनीषा


व्यक्त

कहाँ  व्यक्त कर पाती हूँ
बस भरती  ही जाती हूँ
अपने मन की फैली झोली में
सहेजती जाती हूँ
सारी मौन व्यथाएँ
और दिन दिन बढ़ते आते हैं
असंख्य अनगिनत
हादसों से कँपाए  लोग
अपने अनाम चेहरों पर
दर्द की लकीरें लिए
कांधो पर दुःखती  स्मृतियों का
बोझ लिए
छलके ही आते हैं
मेरे साथ बाँटने स्वयं  को और मुझे
कब जान पाई हूँ मैं
इन निराश व्यक्तित्वों की पीड़ाओं का माप
फिर भी सर झुकाए
बांटे ही चली जाती हूँ
दिए ही जाती हूँ अपना एक हिस्सा
इन इतिहास और अनुभव की हर कहानी पर
जो समोए है एक जिंदगी अपने ही भीतर
हर इतिहास हर किस्सा जीवित है
अपनी ही नक्काशी लिए
फिर भी मानों  सब है अलग
जैसे किसी शहर में बसे पुराने खंडहर हों
और मेरी लेखनी से उतरते शब्द भी
इस अथाह संसार में
डूबती उतरती बूंदे हैं
जो बहती हैं किसी मोती  कि तलाश में
और हर सागरिक
अपनी ही तृषा बुझा इनसे चल देता है
हाथ पोंछ अपने ही किनारे की खोज में

by me मनीषा

Sunday, December 22, 2013

मैं

मैं बार बार लहरों  सी तेरे तट
से लौट जाती हूँ
सागर में हूँ समाहित
फिर भी प्यासी रह जाती हूँ 

मेरे लिए सजन तुम आए ही कब पास मेरे

मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे
शून्य ही तो था हमारे मध्य
और शून्य के दायरों में ही विलीन हो चला है
हमारा संबंध
तुम आए ही कब रिश्तों के धागे जोड़ने
मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे

फिर  न जाने कितने पल हमारे मध्य
इस अंतराल में जुड़ते चले गए
और हम-मैं और तुम में बदलते रहे
तुम आए ही कब सजन
अपने मैं को मेरे मैं से जोड़ने
मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे

अंतहीन प्रतीक्षाओं के उपरांत भी
रीता  ही रह जाना था पथ
पथ -धूलि से केवल कैसे भरती  यह झोली
रिक्त ही रह जानी थी मेरी मांग
मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे

यह जान कर  भी सजन मेरे
मैंने की थी प्रतीक्षा , बाँधा था स्वयं  को तुमसे
और तुम्हारी नि:संगतता को चाहा था
मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे
मझे सहेजने सजन मेरे
मुझे समझने सजन मेरे
मेरे लिए सजन तुम आए  ही कब पास मेरे

by me मनीषा 

यदि हम संग रोते संग ही हँसते

कितना अच्छा  होता 
यदि हम संग रोते संग  ही हँसते 
संग ही भीगते बारिश  की बूंदों में 
और नहा जाते सर्दी की धूपों में 
कभी बच्चे बन जाते तो कभी 
रूठते तुम तो मनाती मैं 
और मेरे रूठने पर तुम रिझाते 
मन की उच्छ्रंखलता रहती चंचलता नैनो में 
कभी रजाई के भीतर बैठे दोनों देखा करते फिल्मे 
मैं डरती तो दुबका लेते तुम 
मेरी उलझनों को पल मे सुलझा देते तुम 
तुम्हारे मेरे दुःख साझे होते 
एक दुसरे  के बिन  बोल हमारे अधूरे होते 
जो तुम न कहते वो भाँप  लेती मैं 
मेरा अनकहा जान  लेते तुम 
कितना अच्छा  होता
यदि हम संग रोते संग  ही हँसते 

वचन

कहाँ चूक गई मैं ?
कहाँ हो गई भूल पथिक
जो कहते हो
मेरे अंचल से तुमने कंटक ही पाए

मैं तो पुष्प भर लाई थी
अपने इस मृदु अंचल में
पर कैसे यह चुभ गए तुम्हे ?
मेरे कोरे प्यार में
विष कहाँ घुल गया पथिक ?
मैंने तो बोना  चाहा था
तुम्हारे आंगन में एक
हरा भरा वृक्ष
जहां तुम शांत विश्राम कर सको
पर तुम कहते हो उसकी छाया
तुम्हे बबूल सी मालूम होती है
हा! पथिक क्षमा
क्षमा पथिक !
अब जान गई हूँ
मेरी आकांक्षाएँ  ही  शायद
इस अंजुरी में भरे फूलों  में
कंटक सी चुभ गई तुम्हें
और घुल गया मेरे प्रेम में स्वार्थ का विष
तभी उग आए हमारे आंगन में
बबूल
और मेरी राह  तकती आँखे तुम्हे
प्रश्न सी खटकने लगीं
पर पथिक , बस इतनी सी विनती है
मुझे मेरी भूल सुधार  लेने दो
बस एक बार फिर मुझे
तुम्हें  अधिकार से निहार लेने दो
बेल सी तुमसे नहीं  लिपटूँगी
वचन देती हूँ
उन्मुक्त तुम्हे तुम्हारे ही आकाश में विचरने दूँगी
और भी मिलेंगे तुम्हे हरे भरे वृक्ष
मुझे न शिकायत होगी
अपने आंचल में तुम्हे नहीं  समेटूंगी
पथिक नही बनूँगी
तुम्हारे पथ की बाधा
बस हाँ
हाँ पथिक केवल पवन सी
रहूँगी  तुम्हारी सहचरी

by me मनीषा

धान सी मैं

आई थी मैं उगने
धान सी
तुम्हारी अनजानी ,अनचीन्ही धरती पर
चाहती थी गहरे पैठ कर तुम्हारे भीतर
अपनी जड़े जमा लेना
पर रिश्तों की  धूप  बहुत प्रखर थी शायद
जो जीवन की  भोर भी
जेठ कि दुपहरी सी प्रतीत होती रही
क्या तुम्हारी प्रीत का
साया झीना था
या मेरी ही जड़े खोखली ?
किससे  पूछूँ  और क्या?
क्या कहीं उत्तर है भी कहीं ?

मनीषा 

रिश्ते

रिश्ते
'गर ये न होते
तो पंछी सा
मन मेरा भी स्वतंत्र होता
अपनी श्रद्धा से
मोती  या कंकर चुनता
काश! ये भूख न होती
प्यास न होती
न होती तड़प  कुछ पाने
और खो देने की
क्या होता जो सिर्फ मैं होती
नर  या नारी
कुछ ना  होती
तब क्या तृप्ति होती ?
By me मनीषा

Saturday, December 21, 2013

अपने प्यार से मुझे बाँधो मत

अपने प्यार से मुझे बाँधो  मत
लौट जाने दो
तुम्हारे शुभ्र उज्ज्वा कांतिमय प्यार की धूप  में
कुछ इस तरह भीग गई हूँ मैं
कि भूल ही जाती हूँ मैं
के तुम्हारे इस बंधन से अलग
मेरा कोई अस्तित्व भी है
इसलिए इससे पहले भूलूँ  मैं
वह जिसे याद करते ही
मेरे पास आ बैठते हैं
क्षोभ , लोभ ग्लानि और विषाद  से घिरे
कुछ खट्ट मिठ्ठे से पल
तुम मुझे लौट जाने दो
वहीं जहाँ  मैं  छोड़ आई हूँ
कुछ रेशम  के धागे
स्नेह भरे दायित्वों  से रंगे
जिन्हे बुन कर ही तैयार करना है
मुझे संसृति से संस्कृति  तक एक सेतु
क्योंकि तुम्हारे प्यार के  इंद्रधनुष के पार भी
 एक  क्षितिज है
जहाँ  कर्म की धरती पर
जीवन तना  सा खड़ा है
मेरा इम्तिहान लेता
एक अनंत रण  का पैगाम लिए
by me मनीषा

Friday, December 20, 2013

पीर

सब कुछ तो है पास तेरे 
सखियाँ कहती है 
दुनिया के सौ सुख 
मन बहलाने को कितने दिलासे 
कुछ मीठे पलों की यादे 
मेरी जायी दो नन्ही मुस्काने
पर जाने कैसी ये हूक अंतर की
कंठ तक उठती नही
हाँ सब कुछ तो है पास मेरे
फिर कैसी ये पीर मेरे
मन में रहती है
by me manisha

Thursday, December 19, 2013

माँ न करना मेरा कन्या दान

माँ  न करना मेरा कन्या दान
मैं तेरी बेटी
तेरी कोख  की जाया
तेरी ही परछाई
जानती हूँ
हूँ मैं बाबा कि दुलारी
पर हर क्षण क्यों  कानों में सीसा  सा  घोलता है
इक तीर सा मन में चुभता है
बेटी तो होती है पराई
जहां जन्मी वो बिछौना  मेरा नही है
तेरे घर का कोई कोना क्यों मेरा नही है
भैया करता है लाड़
पर हर पल होता है अहसास
मेरा इस घर में क्यों अपना कोई नही है
तुम और बाबा बात करते हो
इसे तो अपने  घर ही जाना है
सजन का  घर जा सजाना है
चुटकी भर हल्दी से कर  पीले हाथ
छिन  जाएंगे इस जन्मभूमि से सारे  अधिकार
बाबा कहेंगे अब वो ही घर तेरा है
तुम कहोगी जैसा भी हो निभाना बेटी
बहु  साक्षात् लक्ष्मी बन जाना बेटी
इस द्वार आने के लिए भी सोच विचार करना होगा
जिस ड्योढ़ी पर खेली हूँ
उसका त्याग करना होगा
अगर न लगे वो घर अपना सा भी
तब भी निर्वाह करना होगा
बार बार तिरस्कृति जब भी वहाँ से लौटूंगी
तुम कहोगी तुझ पर मेरा अधिकार नहीं है
यह अब तेरा संसार नही है
लौ जा बेटी सब ठीक हो जाएगा
विश्वास कर इस जग में पूरा सुखी कोई नहीं है
युग युग से हम सब चुप रह कर सहती  आई है
सच मान  बेटी सही व्यवहार यही है
पिया का घर  ही तेरा है
वो माँग  माफ़ी फिर तुझे लिवाने आया है
जा बेटी लज्जित न कर जग में मुझे
अब तेरा निर्वाह वहीं है
माँ  न जन्म देना फिर मुझे
और  इतना ज़रूरी करना हो मेरा गौ सा दान
तब ही देना सुहाग का आशीर्वाद मुझे
'गर दे सको फि घर लौटने का सम्मान मुझे
छिपा कर अपने आँचल  में फिर कर सको दुलार मुझे
दिला सको फिर जीने का अधिकार मुझे
मेरे कतरे पँखो  पर मलहम  रख दे सको उड़ान मुझे
फिर अपने घर के इक हिस्से  में कर सको स्वीकार मुझे
जब कह सको तू मेरी  अपनी है नही है पराई
तब ही देना अपनी कोख पर अधिकार मुझे
माँ मत देना तू तब तक जन्म मुझे
माँ मत देना तू तब तक जन्म मुझे
जब कह सको कि पराया नहीं
आज भी यह घर यह कमरा तेरा है
माँ तब ही करना मान सम्मान से
मेहँदी लगा पिया संग विदा मुझे
पर ना करना  माँ  कभी गौ सा दान मुझे
माँ मत करना मेरा कन्या दान
माँ मत करना मेरा कन्या दान
by me Manisha

टुकड़ा टुकड़ा धूप

टुकड़ा टुकड़ा धूप जब आँगन में आती है 
माँ हर टुकड़े पर रख देती है 
एक एक थाल 
कोई भीगे तिल से भरा 
कोई पापड़, कोई बड़ियों से भरा 
और फिर चुन कर एक टुकड़ा धूप
बैठ जाती है वह स्वयं भी
धीरे धीरे उसके हाथ बुनते हैं
नरम नरम ऊनी स्वेटर
कभी छज्जे पर खुल के आती धूप में
वो फैला देती है निचोड़ कर कपड़े
और किसी पुरानी सूती धोती से
ढक कर रख देती है
ताज़ी तोड़ी सेवइयां
एक समय था जब माँ को
धूप बटोरनी नहीं पड़ती थी
खुले आँगन में धूप नाचती फिरती थी
तब हमे धूप में लिटा कर माँ
धीमी धीमी बहती धार में
कपड़े धोया करती थी
फिर पता नहीं कब हम बड़े हो गए
इसने कि धूप भरा आँगन छोटा पड़ गया
अपने आँगन से , नन्हे से आँगन आँगन से
निकल भागे स्कूलों , कॉलेजों , दफतरों की ओर
और ना जाने कहाँ से उग आईं हमारे आंगन
के चारों तरफ
आकाश छूने को कसमसाती ये बिल्डिंगे
धूप अब किसी छिद्र से झाँकते
आकाश के टुकड़े से टपक भर पड़ती है आँगन में
और माँ अपने खटोले पर बैठे बैठे
ऊन के फंदों के बीच
टुकड़ा टुकड़ा धूप चुनती रहती है
कभी गीले कपड़ों के लिए
कभी आचार के लिए
कभी बड़ियों तो कभी पापड़ के लिए
वह सेंकती रहती है
उम्र से पके अपने बाल और कुम्हलाती देह
उस टुकड़ा टुकड़ा धूप से
जो अब आंगन में टपक भर पड़ती है

by me मनीषा
read this in a kavi sammelan long back and it was much appreciated by everyone

स्मृति

जाऊँगी दूर कहीं लौट कभी क्या पाऊँगी
चाहो तो पास तुम्हारेएक ख्वाब  सी रह जाऊँगी
ढूंढोगे तुम कभी और पुकारोगे मुझे तब
इन तारों भरे अम्बर में इक तारा बन छिप जाऊँगी
किसी दिन इक झोंके सी
हवा में महक सी छिप तुम्हें  छू जाऊँगी
कहीं बैठ जब ऊषा सुनहरे केश लहराएगी
सूरज की लाली बन तुम्हारे मृदु अधरों पर छा  जाऊँगी
बैठे होगे  जब  एकाकी तुम इक  साँझ किसी झूले पर
छज्जे पर गाती  चिड़िया के स्वर में सुर मिलाऊँगी
जब जगती में जीवन संचरित होगा
तुम्हारे मन के भावों में कल्पना सी लहराऊँगी
तुम्हारे कमरे की  खिड़की के सामने
तरु शिखा पर खेलती किरणों  सी
तुम्हारी निगाहों में उतर मुस्काऊँगी
ना लौट सकूं कभी इस देह व्यूह चक्र में
तो भी यूँ  ही सी इक मृदु  स्मृति बन
तुम्हारी आँखों के गीले कोरो में मुस्काऊँगी मैं

मनीषा 

Monday, December 16, 2013

एक स्याह रात

मेरे भीतर एक स्याह रात पलती  है
तू अपनी दस्तकों से इसमें उजाले न भर
मुझे इन वीरानियों की एक आदत सी है
तू अपनी बगिया के इसमें फूल मत भर
मैं रोज़ सूरज सी उगती हूँ ,मरती हूँ कभी
तू मेरे लिए अपनी आँख के कोरे नम मत कर
सपने सा है तेरा आना मेरी दुनिया में
प्यार करता है तो कर पर इज़हार ना कर 

एक किरण

एक किरण रौशनी की 
भटक कर भीतर आ गई थी
मैंने सांकल तो कस के लगाई थी
फिर भी बिना आहट
वो चुपचाप चली आई थी
हल्के से मुझे छू  के बोली
तू मुस्कुरा मैं तेरे लिए आई हूँ
तेरे आंसू आसमाँ  ने गिने है
और कुछ तेरे लिए मोती  चुने हैं

लेकिन पराया था वो अहसास
मेरे भीतर तो सिर्फ तन्हा पन्ने रखे  थे
उसके उजास से डर  गई मैं
इतनी अजनबी थी ख़ुशी कि
इक पल के लिए मर कर जी उठी मैं
 फिर मैंने उसे धीरे से बाहर धकेला
उसकी यादों को एक एक कर उधेड़ा
और
अपने अंधेरो में फिर मस्त हो गई मैं
मनीषा 

Sunday, December 15, 2013

एक फरियाद

फिर पुकार मुझे
चुपके से  ले  मेरा नाम
डूब रही हूँ अपने ही मन के अंधेरों में
अपनी लौ से कर दे रौशन मुझे

बहुत झूठ जी चुकी हूँ
आज तेरे सच में जीने का हौसला हुआ है
तेरी बाँहो  के लिए तड़पी हूँ बेइंतहा
अपने आगोश में छिपा ले मुझे

तेरा साथ तो एक ख्वाब सा है
जानती हूँ फिर भी
मेरे ख्यालो में गुम हो जा और
अपने ख्वाबों में बसा ले मुझे 

Thursday, December 5, 2013

मन मीत

हुए  पथ अलग
अब चलती हूँ मन मीत
है पथ पथरीला
कुछ तुम्हारा
कुछ मेरा
फिर भी चलो
अपने अपने पथ पर
चलते हैं मनमीत
मुझे थामनी है
अपने इस रथ की कमान
तुम सम्भालो अपनी गांडीव
चलो चलते हैं
अपने अपने प्रशस्त पथ पर
हम और तुम मनमीत
तुम करो कर्त्तव्य पालन
मैं करती हूँ सप्तपदी के वचन पालन
अब बिछड़े
न जाने कब फिर ये पथ  मिलेंगे
चलो चलती हूँ मनमीत
मनीषा
शादी की  सालगिरह पर 

प्रभात

जाड़ो की नरम रज़ाई
और अलसाई सी एक अँगड़ाई
हाथों में गर्म चाय का प्याला
और पांव के  तलवे सहलाती नरम धूप
 ज़हन में तुम्हारा ख्याल
और नज़र में उतरता
आज का अखबार
बस इतनी सी कहानी में
बीत गई एक और खुशनुमा प्रभात
मनीषा