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Sunday, December 7, 2014

तेरे पाँव के भंवर

तेरे पाँव के भंवर
तुझे थमने नही देते
मंज़िलों  ने रोका तो तुझे बहुत था
तेरी मोहब्बत के भरम
मुझे किसी का होने नही देते
बड़ी शिद्द्त से चाहा तो मैंने भी बहुत था
मनीषा

तू ढूंढता है

तू ढूंढता है मुझमे ही मुझको
तुझमे समा  के
खुद में बची ही कहाँ  हूँ मैं
मनीषा

Monday, December 1, 2014

तेरी यादों ने

तेरी यादों ने इस तरह बसा रखा है मुझमें इक शहर ।
कहीं भी जाऊं वीरानियाँ नसीब नहीं होती ।।
महफ़िलों में फिरता रहता हूँ अजनबी सा ।
तन्हाइयों में भी तन्हाईयाँ नसीब नहीं होती ।।
मनीषा वर्मा

Thursday, November 20, 2014

छोटा सा संसार था

छोटा सा संसार था
पैरों तले धरती
सिर पर तना आकाश था
तुम्हारे अंचल में
सब चिंताओं को विश्राम था 
कहाँ गया कहाँ गया।
प्यार भरी थाप थी
सुख भरी छाँव थी
स्नेह भरा व्यवहार था
स्वप्न सा संसार था
कहाँ गया कहाँ गया।
होठों पर मधुर गान था
नैनो में मृदु हास था
देहरी पर फैला तुमसे उजास था
स्वप्न सा संसार था
कहाँ गया कहाँ गया। …
प्रारब्ध पथ पर सदा संघर्ष था
संग साथ ना जीवन मीत था
ह्रदय में बसा अनुराग था
स्वप्न सा संसार था
कहाँ गया कहाँ गया। …
मनीषा
20/11/2014

Thursday, October 30, 2014

तुम खुशनसीब हो

तुम  खुशनसीब हो जो आह भर भी लेते हो
मुझे  अपनी उदासी पर
मुस्कान का आँचल गिराना पड़ता है
आँख में उतरे आँसू  को
पलको के भीतर पी जाना पड़ता है
कोई देख न ले तुम्हारी तस्वीर इन आँखों में
इसलिए नज़र  का पर्दा गिरना पड़ता है
ज़िक्र तुम्हारा आए किसी लब पर
दिल को थाम अनजान बन  जाना पड़ता है
पहचान न ले कोई मेरे जी की पीर
इसलिए तेरे दर के सामने से बेपरवाह गुज़र जाना पड़ता है
मनीषा 

Sunday, October 26, 2014

होती कितनी प्यारी त्यौहार की बेला सारी

होती कितनी प्यारी
त्यौहार की बेला सारी
वो गुज़रा वक्त अगर
लौट आया होता

उस घर की टूटी मुंडेरों पर
एक  दीप जलाया होता
तुलसी तो कब की सूख चुकी पर
उस देहरी पर शीश नवाया होता

उस सूने दरवाज़े पर
वंदनवार सजाया होता
माँ के उस छोटे से मंदिर में
बाल गोपाल बैठाया होता

कितने सजते रंगोली
के ये रंग सारे
हमने तुमने अगर
हर त्यौहार संग मनाया होता

मनीषा



Sunday, October 12, 2014

कुछ ऐसे हादसों में गुज़री है इस तरह उम्र

कुछ ऐसे हादसों में गुज़री है इस तरह उम्र
कि  अब नवाज़िशों से डर  लगता है

तन्हाइयों से इश्क़ कर बैठे हैं  इस तरह  हम
कि  अब महफ़िलों से डर   लगता है

तक़दीर  ने फ़ेरा  है इस तरह से हमारा हर कदम
कि अब तदबीरों  से डर  लगता है

इस तरह से निकले गए हैं तेरे दर से ओ हमकदम
कि  अब मस्जिद मज़ारों  से डर  लगता है

कुछ ऐसी ख्वाहिशों ने तोड़ा  है इस कदर दिल में दम
कि अब मन्नतों दुआओं  से डर  लगता है

किसी ने फेर ली है मुझसे इस कदर मोहब्बत भरी नज़र
कि  अब आइनों से डर  लगता है

मनीषा 

Friday, October 3, 2014

कपड़ा तो अब भारत में ही बनता है

क्या करूँ
कपड़ा तो अब भारत में ही बनता है
लेकिन गाँधी  आज भी नग्न फिरता है

जय किसान का नारा आज भी सभाओं में गूंजता है
फिर भी  किसान को मुआवज़े में २ रूपये का चेक मिलता है

रूप कुंवर को फूंक जो समाज पूजता है
वहाँ सती सावित्री होना सिर्फ दमन लगता है

जहां बिना मीडिया के दामिनी को हक़ नहीं  मिलता है
उस समाज में जनांदोलन भी मज़ाक लगता है

हम बिना कागज़ी कार्यवाही के सरिता देवी इन्साफ नही दिला पाते हैं
विदेशों  से अपमान बाँध ले आ आते हैं

 दो अक्टूबर को झाड़ू लगाते नज़र आते हैं
लेकिन अपनी ही गंदगी नज़र बचा कोने में डाल आते हैं

गर्व से कहतें हैं मेरा देश महान है
फिर अपने ही आप को विश्व में शर्मिंदा कर आते हैं



मनीषा 

Monday, September 29, 2014

धीरे धीरे मिट रही हूँ

धीरे धीरे मिट रही हूँ
अंधेरो में अपने  घिर रही हूँ मैं

हौले हौले बिखर रही हूँ
कच्चे कांच सी चटक रही हूँ मैं

धीमे धीमे सुलग रही हूँ
अपनी ही आँच में पिघल रही हूँ मैं

आहिस्ता आहिस्ता बुझ रही हूँ
ज़िंदगी तेरी बाँहो में खो रही हूँ मैं

मनीषा

मेरी खिड़की पर पल भर चाँद टाक दो

मेरी खिड़की पर पल भर चाँद टाक दो
एक चाँद थोड़ी चांदनी
मेरे आंगन में श्वेत आभास
पीपल की टहनियों पर अटक जाए
थोड़ा शर्माए थोड़ा रिझाए
कुछ बतियाए
मुझे गज भर आकाश दो

नरम पुरवाई को पैजनियाँ बांध दो
 मृदु हास  थोड़ा सा प्यार
गुनगुनाती पवन  की प्यार भरी थाप
रूह में बांसुरी कोई  गुनगुनाए
दिल भरमाए कुछ सुनाए
मुझे एक गीत उधार दो

मेरे ख्वाबों को इक पल आँखे उधार दो
एक  आस थोड़ी सी प्यास
गहरी  नींद पल भर का साथ
वो एक आंसू जो पलकों में मुस्कुराए
इन थके पंखो  में उड़ान  उतर आए
पाँव में आज मेरे बादल उतार दो

मनीषा

Tuesday, September 23, 2014

कभी मैंने बांधा नहीं कभी तुमने जोड़ा नहीं

कभी मैंने बांधा नहीं कभी तुमने जोड़ा नहीं
इस तरह चलता रहा संबंधों का सिलसिला
कभी मैंने रोका नहीं कभी तुमने पुकारा नहीं
इस तरह बढ़ता रहा राहों पर फासला
कभी मैंने कुछ कहा नही कभी तुमने कुछ सुना नहीं
इस तरह बढ़ता रहा खामोशियों का साया
कभी मैंने डोर छोड़ दी कभी तुमने हाथ थामा नहीं
इस तरह खिंचता रहा लकीरों का दायरा
कभी मेरे शब्द तीर हो गए कभी तुमने नश्तर चुभो दिए
इस तरह चलता रहा आइनों  का टूटना
कभी मैंने बांधा नहीं कभी तुमने जोड़ा नहीं
इस तरह चलता रहा संबंधों का सिलसिला
मनीषा

Wednesday, September 17, 2014

पथ पर चरण बढ़ाओ

पथ पर चरण बढ़ाओ भविष्य तुम्हारा है
तुम हो नव अंकुर कल का वसंत तुम्हारा है

कोटि कोटि मानस में
जीवन तुम जगाना
बंजर इस भूमि पर
आस पुष्प तुम खिलाना

उगते रवि की किरणों सी
आभ  हो तुम्हारी
कर्म करना वही
दोहराए जिसे संतति

फैले जग में तुम्हारा नाम
तुम बनो भारत की शान
आशीष रहे गुरूजन का
नाम रहे तुमसे कुलवंश का

मनीषा 

चल बटोही पथ प्रतीक्षा रत है

चल बटोही पथ प्रतीक्षा रत है
समेट ले बिखरे अर्थ
और चल पथ प्रतीक्षा रत है
कम नहीं  होती
पथ पर क्लांत धूप
हर पड़ाव से बाँध ले थोड़ी छाँव
और चल
चल बटोही पथ प्रतीक्षा रत है

मंज़िल कोई नहीं  तेरी
कदमों  से लिपटी है बस
अनुभव की कोरी धूल
तू साथ ले चल सर्व कंटक फूल
और चल
चल बटोही पथ प्रतीक्षा रत है

सृष्टि के प्रथम अहसास से
अंतिम श:वास  तक
चलना ही तो है जीवन
धर तू सिर  पर संबंधो की गठरी
और चल
चल बटोही पथ प्रतीक्षा रत है

निश्छल निश्चिन्त तू चल
गंतव्य कोई नही तेरा
कर्म पथ ही बस  है प्रशस्त
सांसो की  अंतिम माला तक
चिता की अंतिम ज्वाला तक
तुझे चलना है
तू चल
चल बटोही पथ प्रतीक्षा रत है
मनीषा 

Monday, September 15, 2014

खाक़ हूँ

खाक़  हूँ ख़ाक़  में मिल जाऊँगी
छू  नहीं  पाओगे
हवाओं  में बिखर जाऊँगी
आँख से तुम्हारी
पानी की तरह ढुलक जाऊँगी
मुझमें  ही  ढूँढना  मुझको
अक्षर अक्षर में उभर आऊँगी
मनीषा 

Sunday, September 14, 2014

हिंदी दिवस है आज अभिव्यक्ति का एक पल चाहिए

भाषा की परिभाषा के लिए दिन चाहिए
हिंदी दिवस है आज अभिव्यक्ति का एक पल चाहिए
हमे आती है इस बात पर हंसी
आजकल हर बात पर एक दिन चाहिए
पिता हो माँ हो बेटा हो या बेटी
सगे सम्बन्धी हों या दोस्त
एहसासों की अभिव्यक्ति के लिए
भी एक दिन चाहिए
राजा हो या मंत्री कैदी हो या संत्री
कुर्सी का किस्सा हो या
किसी घोटाले का मुकदमा
झगड़ा हो या धरना
हर बात पर कहते हैं की दिन चाहिए
प्यार का दिन झगड़े का दिन
तीर्थ का दिन त्यौहार का दिन
जन्म का दिन शादी का दिन
काम का दिन बेकार का दिन
जिसे देखो उसे ही एक दिन चाहिए
रोज़ रोज़ की आपा धापी में मसरूफ इतने हम यहां
की अब तो मरने को भी हमे एक दिन चाहिए
मनीषा

Thursday, September 11, 2014

इस पार न संग चल पाये तो उस पार का भार मत लेना

इस पार न संग चल पाये तो उस पार का भार मत लेना 
मेरी अंतिम यात्रा समय तुम अपने काँधे पर मेरा भार मत लेना 

किस धर्म से संस्कार हों ,किस विधि से पिंड दान हो 
किस पल मेरा श्राद्ध हो, कितनी बार हवन-दान हो 
तुम लकीरों की फ़क़ीरी मत करना 
इस पार न संग चल पाये तो उस पार का भार मत लेना 

गंगास्नान अस्थि विसर्जन तो मात्र काया का होता है 
किस पक्ष देह उठे , किस घाट पर दाह मिले इससे क्या होता है 
मेरी इस मृत देह का श्रृंगार मत करना 
इस पार न संग चल पाये तो उस पार का भार मत लेना 

रूह मेरी यूं भी मुक्ति पा जाएगी 
मेरी संतान के चेहरे पर मुस्कान यदि खिल जाएगी 
मेरे जीवन साथी को क्षण भर विदा बेला मिल जाएगी
तुम मुझ पर अश्रु बर्बाद मत करना
इस पार न संग चल पाये तो उस पार का भार मत लेना

मनीषा

Sunday, September 7, 2014

शिकवा करूँ तो

शिकवा करूँ तो
उन पाक़ अहसासों की तौहीन होगी 
अश्क़ रोक लेती हूँ 

आँख से ढुलके तो उसको शिकायत होगी 
मनीषा

Sunday, August 31, 2014

उसने चाह कर मुझे

उसने चाह कर मुझे, ये कैसी सज़ा अता कर दी 
बना कर अपनी जां , मुझे मौत अता कर दी 
मनीषा






Saturday, August 30, 2014

बात तो कुछ न थी

बात तो कुछ न थी 
उसने दूरियां चुन ली 
और मैंने ठहरे हुए लम्हे 
मैं चुन देती हूँ 
शब्दों में दर्द अपने 
वो चुप रहता है 
मैं पुकारती हूँ उसे हर नफ़स 
और वो मेरी खबर रखता है 
मनीषा

Thursday, August 28, 2014

याद की तश्तरी में

याद की तश्तरी में चाँद परोसे बैठी हूँ
मैं दिल में एक लम्हा समेटे बैठी हूँ

तू खींच ज़मीं पर लक्ष्मण रेखाएँ
मैं सारी बेड़ियाँ खोले बैठी हूँ

तुझे सौंप कर छाँव की पनाहें
मैं आग का प्याला थामे बैठी हूँ

तुझे मंज़ूर होंगी संस्कृति की दुहाईयाँ 
मैं इतिहास जनने बैठी हूँ

मनीषा


Wednesday, August 27, 2014

दिल से दिल के रिश्ते

दिल से दिल के रिश्ते 
अक्सर सिर्फ दर्द बन जाते है 
जो दिल के पास होते हैं 
वही लोग
अक्सर बदल जाते है 
मनीषा

तेरी याद की चिंगारी

तेरी याद की चिंगारी 
रात सिरहाने बैठी रही
मैं मद्धम मद्धम सुलगती रही 
तेरे फैसले फ़ासले बनते रहे 
मैं आहिस्ता आहिस्ता राख होती रही 
मनीषा

खाली झोलियाँ रूखी बोलियाँ

खाली झोलियाँ रूखी बोलियाँ
सुनता रहे गुनता रहे
कैसा ये पागलपन
सब अजनबी चेहरे यहाँ 
अपना कौन यहाँ
ढूँढता फिरे किसको हर पल
फिरता रहे यूँ आवारा मन
खाली झोलियाँ रूखी बोलियाँ
सुनता रहे गुनता रहे
कैसा ये पागलपन
कहीं से तो कोई बुलाए
प्यार के नाम फिर दोहराए
खोजता फिरे ये क्यों अपनापन
सुनता रहे यूँ बावरा मन
खाली झोलियाँ रूखी बोलियाँ
सुनता रहे गुनता रहे
कैसा ये पागलपन
मनीषा

Friday, August 22, 2014

ज़िंदगी, फिर जीत जाती है

क़लम  कुछ रुक जाती है
भार  इस विषाद का सह नहीं  पाती है
लेखनी सीमित रह जाती है
व्याकरण कभी अधूरी रह जाती है
भाव आवेग शब्दों में ढाल  नहीं  पाती है
घात आघात पर  वाणी मूक रह जाती है
फिर न जाने कैसे
इस गहन अंधियार में, एक दीपबाती  टिमटिमाती है
निराशा में आशा जाने कैसे मुस्काती है
एक भोली मुस्कान से,
हारते हारते  ज़िंदगी, फिर जीत जाती है
मनीषा 

Thursday, August 21, 2014

मेरे भीतर अब प्यार नहीं है

मेरे भीतर अब प्यार नहीं है 
सपनो का वो मृदु संसार नहीं है 

आँखों में वो उड़ान नहीं है 
पलको पर उजालों का वास नहीं है 

होंठों पर सहज मुस्कान नहीं है 
मन में वो भोला विश्वास नहीं है 

कदमों में उमंग भरी ताल नही है 
कंठ का वो मृदु गान नही है

विश्वास का कहीं आधार नही है
समर्पण का वो भाव नही है

तुम्हे देने को कान्हा कुछ मेरे पास नहीं  है 
राधा सा प्यार मीरा  का भाव नही है 

तुम पर मेरा अधिकार नही है 
अर्द्धांगिनी कहलाने का वो मान नही है 

मनीषा

Wednesday, August 20, 2014

एक शाम उदास ढल जाती

यूँ  ही दिन गुज़र जाता है
कभी बात करते नहीं
कभी बात हो नही पाती
एक शाम उदास  ढल जाती
मनीषा 

Monday, August 18, 2014

कैसे भूलोगे

तुम भूलोगे हर बात 
मगर मन की खोली हर गाँठ कैसे भूलोगे 

आँखों ने पढ़े जो 
आँखों के भाव कैसे भूलोगे 

बिन शब्द की जो 
उस इक लम्हे हमने बात कैसे भूलोगे 

तुम कर लोगे हमारे बीच खड़ी कोई दीवार 
पर मन के ये एहसास कैसे भूलोगे

छुप कर तुम भी देखोगे मुझे दूर से
मेरा यह साथ कैसे भूलोगे

पूछोगे हौले से हर परिचित से मेरा हाल
मेरा यह गान कैसे भूलोगे
मनीषा

Sunday, August 17, 2014

अब कोई घर बुलाता नहीं

रात भर रौनकें लगाता नहीं
अब कोई घर बुलाता नहीं
सूना बीत जाता है त्यौहार
अब कोई इधर आता नही
सिमट जाती है आँगन में उतरी धूप
कोई सांकल खटखटाता नही
बीत जाते हैं दिन महीने साल
अब कोई प्यार से पुकारता नही

सिमट कर रह गए घड़ी के काँटों 

में सब व्यवहार 
अब कोई साथ वक़्त  बिताता  नहीं
दिलों में उतर चुके जाने कितने मलाल
अपनों को देख अब कोई मुस्काता नही
मनीषा

मेरे घर की सूनी देहरी पर




मेरे घर की सूनी देहरी
पर कुछ उजाले रखे हैं
यादों के पन्नों पर उतरे
कुछ अफ़साने रखे हैं

झड़ती दीवारों की दरारों पर
गुदगुदाते ठहाके रखे हैं
फर्श पर बिखरी धूल पर
अलक्तक कदमों के निशां रखे हैं

उन दो कमरों में बंद
मानमनुहार के तराने रखे हैं
बालकनी में पड़े टूटे तख्त पर
तुम्हारे गुनगुनाते गान रखे हैं

उस घर में सन्नाटों में गूंजते
कुछ तुम्हारे मेरे स्वर रखे हैं
एक दराज़ में सम्भाल माँ ने
तुम्हारे वो ख़त रखे हैं

पुराने आले में सजे
तुम्हारे कुछ उपहार रखे हैं
छीन झपट होती थी जिनके लिए
कुछ उदास थाल रखे हैं

रात दिन हुए तेरे मेरे  बीच के
हास परिहास रखे हैं
उस छत के नीचे आज भी
माँ पापा के आशीर्वाद रखे हैं


सीढ़ियों पर कुछ भूले
पदचाप रखे  हैं
दरवाज़ों पर हल्दी
कुमकुम  के थाप रखे  हैं

मंदिर में अब भी
माँ  के भगवान  रखे हैं
लाल कपड़े में लिपटे
गीता पुराण रखे हैं

ड्योढ़ी पर आस भरे
इंतज़ार रखे हैं
पुरानी अलमारी में संभाल कर
दर्द के अहसास रखे हैं

हर ज़र्रे ज़र्रे में कुछ
अधूरे अरमान रखें है
आँगन की  सूखी तुलसी में
दर्द के अहसास रखे हैं

कैसे सहेजूँ और क्या क्या सम्भालूँ
उस घर में जाने कितने बुझे चिराग रखे हैं

मनीषा

Friday, August 15, 2014

बिटिया मेरी सौगात है





बिटिया मेरी सौगात है 
किस्मत का अनमोल उपहार है 
मेरे घर आया त्यौहार है 
घर भर का श्रृंगार है 

थकी माँ के हाथ में थमा पानी का गिलास है 
पापा के आने पर खिलखिलाता स्वर है 
भैया की कलाई पर सजी राखी है 
भाभी के साथ मृदु गप्पों का अहसास है 

हर कोने में गूंजती पायलो की रुनझुन है 
कमरे में सजी रंगबिरंगी चूड़ियों की खनक है 
घर में फैली कच्ची रोटियों की महक है 
रसोई में नन्हे हाथों से बनी पहली दाल का स्वाद है 

घर की दीवारों पर सजी उसकी कला है 
सहलियों के साथ उसकी गुनगुनाती आवाज़ है 
मन को हंसा देने वाली उसकी तुतली बातें है 
कितने भोले घर घर वाले उसके ये खेल हैं 

जब से आई है मन में कुछ बदल गया है 
जग जैसे सारा मेरा खिल गया है 
ईश्वर का वरदान है 
एक खूबसूरत गुदगुदाता एहसास है 
बिटिया मेरी 
मेरे घर की जान है 

मनीषा



Thursday, August 14, 2014

गुम हो गई 'गर

गुम हो गई 'गर दुनिया की भीड़ में 
लौट के फिर ना आऊँगी मैं
तुम खुशबू सा बसा लो अपने दिल में 
इन तेज़ हवाओं से बिखर जाऊँगी मैं 
मनीषा

Thursday, August 7, 2014

तुम्हे क्या समझूँ


तुम्हे क्या समझूँ ?
और कैसे ?
अपने से हो
पर पराए  लगते हो
कभी रख देते हो
मेरी आँखों में आकाश
कभी कदमों  तले बिछी
धरती भी छीन लेते हो
तुम्हें  ओढ़ लेती हूँ
हर रात ख़्वाब  बुनने से पहले
तुम हो कि  मेरी नींद भी छीन लेते हो
रोज़  दिलासों से सी लेती
हूँ अपना उधड़ा  हुआ रिश्ता
तुम हो कि फिर
नए सिरे  से चीर देते हो
मनीषा 

Tuesday, July 22, 2014

रेप हुआ रेप हुआ है

चीखो मत , चिल्लाओ मत
रेप हुआ है रेप हुआ है
गलती तुम्हारी है
चुप रह कर सिर्फ भुगतो तुम
चीखो मत सड़कों पर यूं बेकार में
रेप हुआ है रेप हुआ है

घर से बाहर क्यों निकली थी
इतनी ऊंची सेंडिल क्यों पहनी थी
स्कर्ट पहन कर घूमो तुम
टाइट जींस में इतराओ तुम
फिर क्यों चिल्लाओ तुम ही
रेप हुआ है रेप हुआ है

माना ओढ़नी तुमने ली थी
दादी तेरी साड़ी  ज़रा  कमर से  नीची  थी
बुर्के में ढका छिपा तुम्हारा अक्स बेहद लुभाऊ था 
कुरता घुटने से थोड़ा ऊंचा था 
चूड़ीदार किसने कहा  था पहनो तुम
अब चिल्लाओ चीखो मत
रेप हुआ है रेप हुआ है

सुबह 4 बजे खेतों में क्या करने गई थी
शाम 5 बजे कोई टाइम है घर आने का
भरी दोपहर में क्या ज़रूरी था बाज़ार जाना
12 बजे रात में क्यों नही सात तालों में सोयी थी
अब क्या होगा चीखने चिल्लाने से
रेप हुआ है रेप हुआ है

चलती हो तो कमर हिलती है
ये चोटी  तो घुटनो, तक लटकती है
बाल कटा कर फैशन करती हो
काजल लाली लिपस्टिक का शौक रखती हो
किसलिए इतना सजती हो
अब भुगतो तुम मत चिल्लाओ तुम
रेप हुआ है रेप हुआ है

बड़े मोबाइल ले कर निकलती हो
कालेज स्कूल के सपने देखती हो
बड़ी कम्पनी चलाओगी क्या तुम
मजूरी कर के कंधे से कंधा क्यों मिलाओगी  तुम
देखो कह  दिया था पछताओगी तुम
अब कैसे चीखो चिल्लाओगी  तुम
रेप हुआ है रेप हुआ है

 गलती तो हो जाती है बच्चों से
जवां खून है नसों में कर जाता नादानी है

बेचारे भोले है हैं चिकन मीट की गर्मी चढ़ जाती है
ये टीवी फिल्मे देख बिगड़ जाते हैं
मर्द तो आखिर बेलगाम घोड़े हैं
तुमको ही ख्याल रखना था
इस तरह घर में नही फिरना था
कुछ भारतीय संस्कारों  का भी ख्याल रखना था
अब चुप भी करो इस चीत्कार को
और बेइज़्ज़त न करो माँ -बाप को
रेप हुआ रेप हुआ है

हम अब इसमें कर ही क्या सकते है
तुम्हे नोचने मारने वाले तो मासूम बच्चे है
अबोध उम्र में जेल नही उन्हें दे सकते हैं
इसको तो ईश्वर भी नही रोक सकते हैं
गलती तो सिर्फ तुम्हारी है
पैदा होते न मारा हाँ  ये भूल ज़रूर हमारी है
अब चुप चाप कहीं डूब मरो तुम
बस बहुत हो चुका  मत बेफिजूल शोर करो तुम
अराजक मत बनो तुम मत चीखो चिल्लाओ तुम
रेप हुआ है रेप हुआ है
 मनीषा 

Monday, July 21, 2014

दुःशासन का कहीं तिरस्कार नही है

अब उन आँखों में हाहाकार नही है
द्रौपदी का चीर लुट चुका
कृष्ण का इस नगरी में वास नही है
दुःशासन  का कहीं तिरस्कार नही है

अब नाचती फिरती है हर आँख में दरिंदगी
सीता के तिनके में अब आड़ नही है
लक्ष्मण का इस नगरी में वास नही है
रावण का कहीं तिरस्कार नही है

उतर  आई है हर आँख में वहशत इतनी
माँ  बेटी का भी अब सम्मान नही है
बंधे किन कलाइयों में राखियाँ
पद्यमिनी अब यहां हुमायूँ का वास नही है

मनीषा

इंसान का तमगा लिए फिरते है

हम हैवान आदम हुए फिरते हैं
इंसानियत मार  चुके
इंसान का तमगा  लिए फिरते है

शान बान  बहुत है अपने पास
जानवरों  से खुद को उम्दा बता लेते  है
हम हैवान आदम हुए फिरते हैं
इंसानियत मार  चुके
इंसान का तमगा  लिए फिरते है

क्या बात है जो भूख मिटती  ही नही हमारी
नोच खा लेते हैं इक इक बोटी
हो बेटे या फिर अपनी बेटी
कत्ल तो आम है
हम तो भून कर खा लेते हैं
शिशुओं  को अपने ही
ज़िंदा दफ़ना  देते हैं
हम हैवान आदम हुए फिरते हैं
इंसानियत मार  चुके
इंसान का तमगा  लिए फिरते है

इज़ाद करते हैं एक से एक हथियार
सुरक्षा का सिर्फ भरम बना लेते है
जिस डाल  पर रहते हैं उसी को काट देते हैं
हम बाप  के सीने में भी खंजर उतार  देते हैं
मोहब्बत के नाम पर सूली पर चढ़ा देते हैं
हर बात पर धर्म का सिला देते हैं
शहर के शहर खुद के नाम पर मिटा देते हैं
अपनी ही बहन बेटी की अस्मत बिकवा देते हैं
हम हैवान आदम हुए फिरते हैं
इंसानियत मार  चुके
इंसान का तमगा  लिए फिरते है
मनीषा 

आम हो गई हैवानियत

लूटी है अस्मत , हुआ है कत्ल
आम हो गई हैवानियत
पड़ी लाश सड़  रही
मर चुकी इंसानियत
धो डालो  अब ये दाग खून के
चलो मय्यत निकाली जाए
चूक चुके आंसू सब
कुछ मोम  पिघलाया जाए
चलो इक जुलूस निकाला जाए
मन को अपने फिर  बहलाया जाए

कर भी क्या सके कोई
आँख में शर्म अब उतरती नही
ये वो भूमि जहाँ
कोई गंगा उतरती नही
मर चुकी है कितनी गुड़िया , ज्वाला, दामिनी
खून पर कहीं खौलता नही
धो डालो  अब ये दाग खून के
चलो मय्यत निकाली जाए
चूक चुके आंसू सब
कुछ मोम  पिघलाया जाए
चलो इक जुलूस निकाला जाए
मन को अपने फिर  बहलाया जाए


सत्ता के गलियारों में खनक
टूटी चूड़ियों की गूंजती नहीं
कलेजे में माओं के हूक भी उठती नही
पहन ली हैं चूड़ियाँ  सभी भाईयों ने
नींद भी पहरेदारों की खुलती नही
मर चुकी है आत्मा कानूनदारों की
धो डालो  अब ये दाग खून के
चलो मय्यत निकाली जाए
चूक चुके आंसू सब
कुछ मोम  पिघलाया जाए
चलो इक जुलूस निकाला जाए
मन को अपने फिर  बहलाया जाए

मनीषा 

Monday, July 14, 2014

ज़रा चुप लगाइये

अच्छे दिन चल रहें है
क्यों भला माहौल बिगाडिये
बस ज़रा आप चुप हो जाइये

सोते को मत जगाइए
गफलत में ही सही जी रहे हम
मज़े में अभी हाट-दुकान चलाइये
 बस ज़रा भाई आप चुप लगाइए

खुश हैं लोग सभी आप मत दर्द दिखाइए
कड़वी दवा कुछ आप भी निगल जाइए
बस ज़रा अब ज़ुबां  को लगाम लगाइए

अच्छे दिन बड़ी खींचतान से
ले आए है लोग दुरुस्त
अपना बेराग मत अलापिए
ज़रा थोड़ा चुप लगाइये

बड़ी मुश्किल से मिलती है
दिल्ली में चार पैरों की
एक कुर्सी महाशय शौक फरमाइए
आप तो बस चुप लगाइए

अभी तो लगी भी नही आप के
नए बंगले में नई जाफरी
ज़रा सुस्ताइए
आप जनाब ज़रा सी तो चुप लगाइये

बड़े इंतज़ार से आएं
है मेरी किस्मत से अच्छे दिन
किरकिरी मत बजाइए
आप जनाब बस बहुत हुआ
मत कराहिए
जनाब  ज़रा चुप लगाइए

खाइये गलियां भी ज़रा मत घबराइये 
इश्क़ किया है वतन से तो कुछ थप्पड़ भी खाइये 
जनाब अब ज़रा चुप लगाइये 

अच्छे दिनों के कुछ तो आप भी मज़े उड़ाइए 
मुझे तो अपने साथ सरे आम न पिटवाइये 

जनाब अब ज़रा चुप लगाइये
जनाब अब ज़रा चुप लगाइये
मनीषा

Sunday, July 13, 2014

जमीँ की धूल थी

जमीँ की धूल थी आसमा की चाह कर बैठी । 
अपनेँ ही हाथोँ दिल की दुनिया तबाह कर बैठी । 
कभी खत्म न होँगी अब जिसकी सजाऍ, 
या खुदा ये मैँ कैसा गुनाह कर बैठी ।

Saturday, July 12, 2014

ज़िंदगी की दोपहर

ज़िंदगी की दोपहर में
कुछ दुःख तेरे होंगे
कुछ गम मेरे हैं
चल मिल कर बाँट ले
अपनी अपनी खुशियां
मनीषा  

भाँवरों के भंवर में

भाँवरों के भंवर में 
धीरे धीरे बंटती रही 
थोड़ी थोड़ी मैं 

भटकन लिए पाँव में 
फिरती रही आवारा सी मैं 

तुझमे सिमट कर इक पल में 
खुद में बिखर गई मैं 

मनीषा

सारा जहां

सारा जहां मिलता है 
बस इक वो नहीं मिलता 
जिसमे जहां मिलता है 
मनीषा

Thursday, July 10, 2014

मेरे भीतर एक स्याह रात पलती है

मेरे भीतर
एक स्याह रात पलती है

सुलझी उलझी
विचारों के ताने बाने में
कभी जीती कभी मरती है

हंसी उतरती है चेहरे तक
मन के किसी कोने में फिर
एक टीस सी उभरती है

बहुत कुछ है
फिर भी एक कमी सी
तो खलती है

लम्हों लम्हों में
बटी ज़िंदगी रोज़
धीमे धीमे गुज़रती है
फिर भी कहीं उसी
इक पल के किनारे ठहरी सी
लगती है

महफ़िलों  में लगी
रहती हैं  रौनक सी
मेरी  रूह ही मुझे
अजनबी सी लगती है

जहां चाहूँ वहाँ  नही मिलती
ज़िंदगी किसी अनाथ
उत्तर सी
प्रश्न की तलाश में भटकती है

मेरे भीतर एक
स्याह रात पलती  है
अपने आप में
हर बात अधूरी सी लगती है

मनीषा 

Sunday, July 6, 2014

ख्वाब जा बैठे तेरे पहलू में

आज भी दिन गुज़र गया
तेरे इंतज़ार में
फिर रात , ख्वाब जा बैठे
तेरे पहलू   में


लाऊँ कहाँ से दिल की तस्सलियाँ
तेरे बिन जो चेहरे पे खिल जाएँ
रोज़ रोज़ वो झूटी खुशियाँ
आँखों में पढ़ लेती हैं मेरी सखियाँ
मेरे दिल की मायूस कहानियाँ


मनीषा 

Thursday, July 3, 2014

तुम मेरे बचपन के मीत

तुम मेरे बचपन के मीत
जैसे भूला हुआ कोई गीत
अनमोल धरोहर जैसे मिल जाती है
तुम्हारे संग झूले की वो पींगे  याद आती हैं

दुनिया में भटक जो बातें खो गई थी
खुद को ही मैं जाने कब से भूल गई थी
पन्नों  में दबे फूलों  से जब डायरी कभी मेरी महक जाती है
तुम्हारे संग मुझे, मेरे परिचय की याद आती है

अपने चेहरे पर जाने कितने मुखौटे ओढ़े
बरसों बरस में जाने कितने स्वप्न भूले
थके राही  को जैसे अमराइयाँ मिल जाती हैं
तुम्हारे संग वही हँसी  दिल में उतर जाती है

मनीषा


इन हाथों में सजदा है

इन हाथों में सजदा है
प्यार है दुआ है
नटखट शोख शरारत है
इन हाथों में तसल्ली है
भरोसा है विश्वास है
सपंदन है साथ है
एक अटूट विश्वास है 

Thursday, June 26, 2014

इक गुनाह का पल दे दो

हक़ तो नहीं  कि  तुम्हे
अपना  कह सकूँ
तुम्हारी हो रहूँ  इतना
गुरूर  भी नही

अपनी पनाहों में
इक  गुनाह का पल दे दो
बस दुआ का इक  हक दे दो
मेरी रूह को आ जाए चैन
'गर मेरे ज़नाजे को कांधा दे दो

मनीषा 

Thursday, June 19, 2014

तुम्हारी देहरी तक जाते

तुम्हारी देहरी तक जाते
ये पग मेरे हार जाते
बिन अधिकार कैसे आऊँगी
वो ड्योढ़ी न लाँघ पाऊँगी

तुम से जो प्यार मेरा है
ये लगाव अजब अलबेला है
कभी ना शब्दों में  ढाल पाऊँगी
तुम को बिसार  भी ना पाऊँगी

मनीषा

देर कर के आने वाले मीत

देर कर के आने वाले मीत 
तुम लौट कर आए तो हो दस्तक देने 
पर इस खाली मकां में 
अब बचा ही क्या है 
खंडहर के सिवा 
जर्जर दीवारों को कितना 
सहलाओगे 
अब इन में रखा ही क्या है 
दरारों के सिवा 
पुकारते रहोगे नाम ले कर परिचय पुराने 
अब यहाँ बचा ही क्या है
सन्नाटों के सिवा

मनीषा

Monday, June 16, 2014

एक चिट्ठी पापा के नाम की...



उम्र के उस पड़ाव पर खोया था आपको 
जिसकी याद नही है मुझे खुद को 
बस सुनती आई हूँ बातें माँ से 
बुआ से, मौसी से, दादी से  आपके हर अपने से 

मुझ तीन माह की बच्ची को सुलाने को 
सड़कों  पर देर रात टहलते थे आप कैसे 
कंधा आपका चूस चूस कर दिया था मैंने लाल कैसे 
स्कूल में दस पैसे कैंटीन के लिए 
माँगने  भाग आती थी मैं  रोज़ कैसे
कुछ यादें है आपकी जैसे 

रोज़ रोज़ मेरा सहेलियों में आपका रुआब दिखा इतराना 
प्रेयर बंक कर आपके ऑफिस  में छुप जाना 
ऑफिस से थक  कर आना फिर तैराकी के लिए जाना
 वो भइया  के साथ रोज़ सुबह  दौड़ लगाना 
मुझे वो पहली बार बस में अकेले भेज देना 
और आपके वो लेक्चर 
इस कान से सुन उस कान  से निकल देना 
वो आपका कॉफी  फेंटना वो पुलाव बनाना
यार दोस्तों की महफ़िल सजाना 
धीमे से कुछ कह ठहाके बिखराना 
सच आज भी सबको याद आता है 

आज भी जब कोई मिलता है
जब कह आपकी बिटिया पुकारता है 
मन उसाँस भर रहा जाता है 
जाने विधाता क्या चाहता है 

कुछ प्यार के पुष्प आपने छोड़े है 
जो हमने बहुत प्यार से रखे हैं 
जाने उस पार क्या है 
इस पार तो बस केवल अहसास है..... इंतज़ार है 

मनीषा 

Tuesday, June 10, 2014

क्षणिक



तू जब नही था तो कोई कमी भी नही थी 
तेरे चले जाने से अब जाने ये कमी सी क्यों है 
मनीषा



जो बीती तेरे दामन में वो ज़िंदगी थी
बाकि हर लम्हा साँसें तो आनी जानी ही हैं
मनीषा 

Monday, May 26, 2014

बद से बदनाम

बद  से बदनाम हो गए
जो चोर थे हाकिम हो गए
निकले थे जो जुलूस सड़कों पर
व्यर्थ के उन्माद हो गए
मनीषा 

बुरा लगता है

अंधे को अँधा मत कहिए बुरा लगता है
लंगड़े को लंगड़ा मत कहिए बुरा लगता है
चोर को चोर मत कहिए बुरा लगता है

सच को लगा दीजिए ज़रा चुप बुरा लगता है
साहस को भरिए जेल में ठूंस बुरा  लगता है
हार को न कहिए हार बुरा लगता है

मुंह छुपा गई सब नीतियां  बुरा लगता है
मनाइए अपनी ही मौत पर जश्न बुरा लगता है
आवाम लगा गई चुप बुरा लगता है
मनीषा

Sunday, May 11, 2014

माँ थी तो मान था

माँ थी तो मान था 
बड़ा गुमान था 
कब पूरी हो जाती थीं ख्वाहिशें 
इसका ना कोई अहसास था

माँ भाँप लेती थी 
ज़रूरत होने से पहले पूरी हो जाती थीं 
माँ से मायका था 
उस घर लौटने का एक चाव था 
रोज़ रोज़ फ़ोन की घंटी का इंतज़ार था 
हर सावन आने का न्योत था 
माँ थी तो बड़ा मान था
हम में भी बड़ा गुमान था

व्रत त्यौहार कुछ पूरे पूरे से लगते थे
नीम के पेड़ पर झूले से लगते थे
गाँव घर मे मेले से लगते थे
रात भर बातों के सिलसिले चलते थे
घर में पापा के ठहाके गुंजित रहतें थे
माँ थी तो कहाँ हम अकेले से लगते थे
माँ थी तो बड़ा मान था
हम में भी बड़ा गुमान था

घर में पकवान के रेहड़े से लगते थे
चौके मे डब्बे भरे से रह्ते थे
जब घर पहुंचो उसे हम दुबले से लगते थे
कपड़े भी सारे धुले मिलते थे
उसे मेरे बाल हमेशा लम्बे लगते थे
उसे सारे मेरे दोस्त बेटों से लगते थे
माँ थी तो बड़ा मान था
हम में भी बड़ा गुमान था


मेरे लिए पापा से भी लड़ जाती थी
हर चोट उसकी एक फूंक से ठीक हो जाती थी
जो रुलाए मुझे उसे कोसे जाती थी
माँ के आँचल से मैं हाथ पोंछ आती थी
वो गोद मे सिर रख बाल हौले से सहलाती थी
सच बड़े मज़े की मीठी मीठी नींद आती थी
माँ थी तो बड़ा मान था
हम में भी बड़ा गुमान था

कहानी सुना मुँह मे कौर भर देती
कभी डपट कर थाली मे एक और रोटी धर देती थी
जाते समय लड्डू आचार से एक और बैग तैयार कर देती थी
आँखे पोंछ पोंछ आँचल गीला कर लेती थी
सच माँ थी तो बड़ा मान था
हम में भी बड़ा गुमान था
मनीषा

Friday, May 9, 2014

सच कुछ भी तो नहीं चाहा था

ये तो नहीं  सोचा  था
यूँ  चुप हो जाना
बातों  में टाल जाना
न मुस्कुराना
न पास आना
इस तरह भूल जाना
ये तो नहीं  सोचा  था
कुछ तो नहीं  माँगा था
एक सच सा  रिश्ता
एक छोटा सा सपना
कुछ प्यारी सी बातें
मान मनुहार
बस कुछ तो नहीं  माँगा था
लेकिन तुमसे इतना तो चाहा था
चलते चलते  फिर मिलने का वादा न सही
मुस्कुरा कर एक अलविदा तो कहते
सच कुछ भी तो नहीं चाहा था




Friday, April 25, 2014

ज़रूरत

ज़रूरत तो किसी बात की कभी नही होती
ज़रूरत ज़िंदगी में फिर भी कम नही होती
शामिल हूँ एक उलझन सी आपकी महफ़िल में
देखा जाए तो ज़रूरत आपको तो मेरी भी नही होती



मॉँग लेती हूँ तुझे रोज़ टूटते सितारों से 
देखती हूँ कब तलक़ रखती है 
ये कायनात भी तुझे जुदा मुझ से 
मनीषा

Wednesday, April 23, 2014

बाग़ यूँ उजड़ गया

बाग़ यूँ उजड़ गया
बागबाँ देखता रहा
कली कली सिहर उठी
आंसू जो थिरक उठे
शबनमें ढुलक गई
सुर्ख लाल रक्त सा
गुलाब यूँ मुरझा रहा
बूटा बूटा कराह गया
कोहरा ऐसा छा गया
हवाएँ भी रो पड़ी
माटी तर हो गई
रक्त समुद्र में भरा
चाँद सिसकिया ले रहा
तारे भी सहम गए
रात वहीं ठहर गई
अँधेरा किरण निगल गया
रात से दिन डर गया
भोर का सिन्दूर छिपा
गगन का चन्द्रमा डूबा
ज़िंदगी मौत से ढँप गई
रोए नन्हे फूल प्यारे
झुलसी कोपलें कँवारी
कहर ये कैसा आ पड़ा
धरा हृदय रो पड़ा
मानवता तेरी सो गई
ज़िंदा लाशे दिख रही
विहार में बहार व्योम थी
माली शून्य मन से तक रहा
गगन रक्तिम हो चला
उषा पे वैधव्य छाया
सूर्य भी सिमट चला
खो गई हर ख़ुशी
तमन्नाएँ सब मर गई
जाग मानव जाग जा
प्यार क्या है प्रीत क्या
जीवन का है गीत क्या
गीत का है सार क्या
गुरबानी की अरदास क्या
क्या लिखा कुरान में
क्या कहा तेरी बाइबल ने
मीत से मीत मिला
दिल से दिल को मिला
खिला दे बस इक हंसी
जाग उठेगी बहार भी
प्रेम प्रीत बहेगी
हर साँस जी उठे
ऐसा गीत कोई गा
नया सुर तो आज सजा
खिला दे नई रौशनी
झूम उठे ज़िंदगी
मनीषा

मेरी व्यथा को अभी सोने दो

मेरी व्यथा को अभी सोने दो
छाई है अलसाई चाँदनी
मुझे मधु-मस्त रहने दो
जागा  है भाव सागर
 लहरों को अभी मचलने दो

मेरी व्यथा  को अभी सोने दो

कब कब आती है पूनो
अमा रही अब तक जीवन पर छाई
निकल आया है ये कैसे
भूले से आज उजास
ज़रा रंगोली सजोने दो

मेरी व्यथा  को अभी सोने दो

स्थिर जल में कम्पन
ज्वार उठा है तो जल चढ़ने दो
रंग जाए आज धरा
इतना रंग बिखरने दो
बांधो तोरण द्वार
दो ढोलक पर थाप
गा लो मंगल गान
नभ पर मेहंदी रचने दो

मेरी व्यथा  को अभी सोने दो
मनीषा

वो रह तो लेता है खुश मेरे बिना

वो रह तो लेता है खुश मेरे बिना
फिर भी अक्सर मुझे पुकारता क्यों है
लगता तो है की उसे मेरी फ़िक्र नही
फिर भी इस तरह निहारता क्यों है
चाहती हूँ भूल जाऊँ  उसे सदा के लिए
फिर भी ख्यालो में वो मुस्कुराता क्यों है
मनीषा

जब मिलते हो तब कहते हो "चलो"

जब मिलते हो
तब कहते हो "चलो"
हर बार
पर कहाँ  ?
और कहाँ  तक ?
कैसे जा सकते हैं ?
तुम और मैं
साथ साथ
क्षितिज से परे
स्नेहिल धागों
के दायरों के पार
कोई अस्तित्व
कैसे रच सकते हैं पुनः
अपनी एक परिधि ?
जो बंध गए बंधन
तुम्हारे और मेरे
दायित्व उत्तरदायित्व
कर्म अकर्म  की भाँवरें'
जो स्वयं ही बाँध ली
अपने पैरों में -
जाने अनजाने
कैसे चल सकते हैं
अब हम साथ साथ
अपने लिए एकमात्र
अभी तो जीबन जीना है
हमे अलग ही रहना है
अपनों में अपनेपन के रंग भरने है
और साथ साथ
एकसाथ
मगर दूर रहना है
तुम मिला करो
मुझे हर पल
मैं मिलती रहूँ तुम्हे
हर क्षण
दिनभर की कड़ियों में
से कुछ कुछ लम्हे चुरा
यूं ही साथ रहना है
दूर दूर मगर
साथ साथ
जुदा  जुदा
पर पास पास
एकदूसरे के  आसपास

मनीषा 

धीमे से कह गया कोई

ख्याल रखना अपना
धीमे से कह गया कोई
मेरी अंजुरी से दर्द उठा
पुष्प भर गया कोई
एक  आलिंगन में
मेरे दर्द अपने कर गया कोई
मेरे लबों पर हँसी
पलको पर आँसू  छोड़ गया कोई
फिर आने का वादा कर
मेरी तन्हाई से अपनी
यादें जोड़  गया कोई
मनीषा 

हर इक आँख नाम है यहाँ

हर इक आँख नाम है यहाँ
हर दिल में कुछ गम हैं यहाँ
हर शख्स मुस्कुरा के मिलता है यहाँ
तन्हाईयों  का दर्द से रिश्ता है यहाँ
मनीषा 

Tuesday, April 22, 2014

प्यार छू कर गुज़र गया था

प्यार छू कर गुज़र गया था कभी 
कसक कहीं भीतर बाकी है अभी 
वो वादा तो न कर गया था आने का 
दिल में एक उम्मीद बाकी है अभी 

पलकों में उतरते नही ख्वाब कभी 
सहर तक रहती है आँखों में नमी 
वो बातें तो करता था मिलने की अक्सर 
इसलिए रहती है दरवाज़े पर नज़र टिकी अभी 

मनीषा

खुदा के बस में


तेरे साथ सुबह ने मेरा दिन महका दिया 
रात आई तो तेरी बातों ने जहां भुला दिया 

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ता उम्र उसके मुन्तज़िर गुज़ार दी 

जो शख़्स दफन था सीने में 
वो मेरी गलियों में भटक रहा था 
मैं ढूंढ रही थी जिसको सारे शहर में 

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जो मिल जाए वो ज़ुस्तजू क्या 
जो पूरी हो जाए वो ख्वाहिश क्या 
एक नज़र में जो न बदल दे दुनिया
है वो आतिश-ए -इश्क़ क्या 

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रहनुमा समझ थामा था जिनका हाथ 
वो भी दामन बचा बचा कर निकले 
जिनके लिए रोए उम्र भर 
वो ही मेरे हाल से बेखबर निकले 

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ख्वाब सा कोई छू कर 
करीब से ऐसे गुज़र गया 
न सुबह हुई न शाम हुई 
बस दिन इंतज़ार में ढल गया 

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आज कोई नहीं है साथ मेरे 
फिर भी कारवां लिए चलता हूँ 
इक तू है और बस ख्वाब तेरे 
जिसे तलाशता गली गली फिरता हूँ 

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तुम मेरे हाथों की लकीरों में पीरों को दिख जाते हो 
हर रोज़ आरती में दुआ बन के लब पर उतर जाते हो 

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खुदा के बस में 

बस इतना ही था 
की मुझसे अलग तुझे 
रख दिया उम्र भर के लिए 
इस तड़प इस दीवानगी 
इस आशिक़ी के मिज़ाज़ को 
वो भी कम ही तौल बैठा


मनीषा