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Wednesday, April 23, 2014

जब मिलते हो तब कहते हो "चलो"

जब मिलते हो
तब कहते हो "चलो"
हर बार
पर कहाँ  ?
और कहाँ  तक ?
कैसे जा सकते हैं ?
तुम और मैं
साथ साथ
क्षितिज से परे
स्नेहिल धागों
के दायरों के पार
कोई अस्तित्व
कैसे रच सकते हैं पुनः
अपनी एक परिधि ?
जो बंध गए बंधन
तुम्हारे और मेरे
दायित्व उत्तरदायित्व
कर्म अकर्म  की भाँवरें'
जो स्वयं ही बाँध ली
अपने पैरों में -
जाने अनजाने
कैसे चल सकते हैं
अब हम साथ साथ
अपने लिए एकमात्र
अभी तो जीबन जीना है
हमे अलग ही रहना है
अपनों में अपनेपन के रंग भरने है
और साथ साथ
एकसाथ
मगर दूर रहना है
तुम मिला करो
मुझे हर पल
मैं मिलती रहूँ तुम्हे
हर क्षण
दिनभर की कड़ियों में
से कुछ कुछ लम्हे चुरा
यूं ही साथ रहना है
दूर दूर मगर
साथ साथ
जुदा  जुदा
पर पास पास
एकदूसरे के  आसपास

मनीषा 

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