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Thursday, July 10, 2014

मेरे भीतर एक स्याह रात पलती है

मेरे भीतर
एक स्याह रात पलती है

सुलझी उलझी
विचारों के ताने बाने में
कभी जीती कभी मरती है

हंसी उतरती है चेहरे तक
मन के किसी कोने में फिर
एक टीस सी उभरती है

बहुत कुछ है
फिर भी एक कमी सी
तो खलती है

लम्हों लम्हों में
बटी ज़िंदगी रोज़
धीमे धीमे गुज़रती है
फिर भी कहीं उसी
इक पल के किनारे ठहरी सी
लगती है

महफ़िलों  में लगी
रहती हैं  रौनक सी
मेरी  रूह ही मुझे
अजनबी सी लगती है

जहां चाहूँ वहाँ  नही मिलती
ज़िंदगी किसी अनाथ
उत्तर सी
प्रश्न की तलाश में भटकती है

मेरे भीतर एक
स्याह रात पलती  है
अपने आप में
हर बात अधूरी सी लगती है

मनीषा 

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