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Thursday, December 31, 2015

लोग कहते हैं मुबारक हो साल बदला है

ना चाल बदली है ना हाल बदला है
लोग कहते हैं मुबारक हो साल बदला है

अपनी तो वही  मस्ती फ़ाक़ापरस्ती है
बस कुछ अपनों के देखने का अंदाज़ बदला है

वो आज भी पास से नज़र बचा के  निकल जाते है
न हम बदले ना अपना आशिकी का अंदाज़ बदला है

मुफलिसी ने बदल दिए  है कुछ हालात ऐसे मेरे
दोस्तों के मिलने का बस ज़रा अंदाज़ बदला है

ना चाल बदली है ना हाल बदला है
लोग कहते हैं मुबारक हो साल बदला है
मनीषा 

Friday, December 18, 2015

क्या कहूँ के जलता है लहु मेरा

इस शहर में एक रात  दफन है
यहाँ  अब सूरज नहीं  उगता
चांदनी मर चुकी है एक भयावह मौत
चाँद सिर्फ बुझ के रह गया
चीख कर थक  चुके अब परिंदे खामोश हैं
तर्क से तर्क न्याय से न्याय ही
हार के रह गया
जिन्होंने जलाई थी मोम  की बत्तियां
उन हाथों में मोम  पिघल  के रह गया
सेक ली सब सियासत दारों ने अपनी अपनी रोटियां
हम  कमनसीबों के भाग में जूनून रह गया
क्या कहूँ  के जलता है लहु  मेरा
आज फिर ये कानून अँधा रह गया
मनीषा

Friday, November 20, 2015

माँ तू बहुत याद आती है

हर मौके पर कमी खल जाती है
माँ तू  बहुत याद आती है
सुख में सोचती हूँ तू कितना खुश होती
दुःख में तेरी गोदी याद आती है
लगती है पांव में ठोकर तो
उफ़ तेरी दुहाई निकल आती है
जब आती है किसी बात पे हँसी
तेरी ही कसम काम आती है
सुनती हूँ जब अपने खाने की तारीफ़
तो जो तूने खाई थी बड़े प्यार से
वो जली रोटी याद आती है
थक कर जब सोती है मेरी बेटी
तो तेरी ही लोरी  याद आती है
जिनसे फुसला लेती तू मुझे
तेरी वो कहानियाँ याद आती हैं
मेरे देर से आने पर तेरी बाल्कनी में टहलने
की वो आदत आज भी आँखे नम कर जाती है
सच अब गलतियों पर जो नही पड़ती
ज़ोर की फटकार वो याद आती है
जो तू समझ जाती थी मेरे बिना कहे
वो हर बात याद आती है
मान सम्मान या व्यवहार
हर बात अनकही रह जाती है
तेरे बिना अब सच माँ
हर ख़ुशी अधूरी ही  रह जाती है

मनीषा
20 /11 /2015


घर अब मकान हो गया है

तेरे जाने से सब उदास हो गया है
जिसे बनाया संवारा करती थी तू कभी
वो घर अब मकान हो गया है

दरवाज़े पर कोई पद्चाप नही है
छत पर पड़ी दरार वहीं है
उस आखिरी दीपावली पर लगाया थाप वहीं है
मुंडेर पर पड़ा अधजला दीप भी अब उदास हो गया है
वो घर अब मकान हो गया है

कोई डोलियां उतरती नहीं
शहनाइयाँ अब वहां बजती नहीं
ढोलक पर थाप पड़े एक अरसा हो गया है
देहरी पर  खिलखिलाहट  गूँजे एक ज़माना हो गया है
 वो घर अब एक मकान हो गया है

दीवारें अब धीरे धीरे झरने लगी हैं
गुलाबी फ़र्श पर पड़ी काई अब छुटती नहीं है
सीढ़ियों पर आने जाने  के निशां अब मिटने लगे हैं
तेरी यादों से भरा बेमोल आँगन बिकने को तैयार हो गया है
वो तेरा घर अब मकान हो गया है
मनीषा
20 /11 / 2015

Thursday, October 15, 2015

बात करो

गौमांस और पुरुस्कार छोड़ो जो मार दिया तुमने सरेआम उस निर्दोष इंसान की बात करो मनीषा

वाह रे ! इंसान

अजन्मी कन्या  के नसीब में गर्भ में मुक्ति
फिर नौ दिवस कन्या रूप देवी भक्ति
वाह रे ! इंसान

कर्म और भगवान दोनों की चुप्पी
थोड़े दान थोड़ी भक्ति पांच वक्त की नमाज़
पाप मुक्ति  कर दी कितनी आसान
वाह रे ! इंसान

हज तीर्थ सब जन्नत के द्वार
पंडित मोमिन पादरियों ने
थमा दी एक कुंजी आसान
वाह रे ! इंसान

जीव हत्या तो पाप
संगसार तो जन अधिकार
धर्म हत्या हुई कितनी आसान
वाह रे ! इंसान

क्षुधा विवश करती तो जानवर लेता है प्राण
लालच लोभ बना देती है मनुष्य को हैवान
फिर भी बताता है खुद को महान
वाह रे ! इंसान
मनीषा

Sunday, October 11, 2015

फिर चली है आज मेरे शहर में हवा चुनाव की

कड़क खादी कुर्तों में सजे हैं
फिर से कतार बांधे खड़े हैं
गली कूचों में नेता अभिनेता
हाथ जोड़े खड़े हैं
लगता है
फिर चली है आज मेरे शहर में हवा चुनाव की 
कौन सी आपदा पिछली सरकार की वजह से फूटी है
शहर में बिजली पानी की कितनी कमी है
महिला विकास की बात फिर उठी है
एक दुसरे के कच्चे चिठ्ठे गिनाने लगे हैं
किसने किए कितने घोटाले सभी बताने लगे हैं
लगता है 
फिर चली है आज मेरे शहर में हवा चुनाव की 
लगा लेते हैं जन गण को सीने से
उठा लेते हैं गोद में गली के बच्चो को प्यार से
लुभा रहे हैं कातिल मुस्कान से
चाशनी सी टपक रही है इनकी बातों से
लगता है 
फिर चली है आज मेरे शहर में हवा चुनाव की 
भाषणों में गरजते हैं
विरोधियों पर बरसते हैं
करते हैं सियासत बात बेबात पे
कभी राम मंदिर कभी गौमांस पे
आरोप प्रत्यारोप के बादल हैं बहार पे
लगता है 
फिर चली है आज मेरे शहर में हवा चुनाव की 
मनीषा

Thursday, October 8, 2015

एक पुरानी एलबम में

एक पुरानी एलबम में कैद रखे हैं कुछ लम्हे
 जब ज़िंदगी से कुछ वक़्त  मिलता है तो जी लेते है
तस्वीर दर तस्वीर
कुछ मुस्कुराहटें लौट है होंठो पर
कुछ आँसू  पलकों  में झिलमिला  जाते हैं
मनीषा 

Tuesday, August 18, 2015

चलो बंद करे द्वार प्रतीक्षा के

चलो बंद करे द्वार प्रतीक्षा के
लौट चले हम फिर अपनी अपनी दुनिया में
ना पट  तुम थपथपाना
ना मैं राह  तकूँ
अब मत पुकारना तुम
मुझे अपनी तन्हाईयों में
और मैं खुद को भूलूँ तुम्हे भुला देने में
मनीषा 

Saturday, August 15, 2015

बरस बाद फिर वही दिन आया

बरस बाद फिर वही दिन आया
आज सबको अपना वतन याद आया
जश्न -ए -आज़ादी मनाई सबने
एक बार फिर सबको इतिहास याद आया
अलमारी में रखा खादी का कुरता पायजामा 
कड़क इस्त्री हो इतराता बाहर आया
हर दरो दीवार पर सजा तिरंगा
शाम तक सड़कों पर फिर गिरा पाया
किसी को गांधी किसी को भगत सिंह याद आया
किसी ने सीधा तो फिर किसी ने उल्टा ही तिरंगा लहराया
कितने भूले बिसरों को खबरों की तरह
कारगिल युद्द और अट्टारी बॉर्डर याद आया
जो खा गया है दीमक की तरह मुल्क को
वो भी आज शहीद-ए -मज़ार पर फूल चढ़ा आया
मनीषा

जिन कंधों ने संगीन उठाई उनके साथ ही द्रोह हुआ

जिन कंधों ने संगीन उठाई
 उनके साथ ही द्रोह हुआ
उस पर उनके अपने ही
आज हाथ उठाते है
सम्मान कभी मिलना था जिन्हें
 घूँट अपमान का पी रह जाते हैं
जिन कंधों ने संगीन उठाई
 उनके साथ ही द्रोह हुआ

अपना ही अधिकार मांगना
हो अपराध कब से गया
तिरंगा जिस के शव का हो अधिकार
वह इतना विवश क्यों हो गया
देश के पूर्व प्रहरी को
जो आँख दिखाते हैँ
याद करें कभी उसकी निगरानी में
सपने सुखद सजाते थे
जिन कंधों ने संगीन उठाई
उम्र के बोझ तले झुके जाते हैं


सीमाओं की रक्षा के लिए उसने
जीवन भर संघर्ष किया
घर जो लौटा तो पाया
भाई ने भाई से भेद किया
जिस घर गांव की रक्षा में
उसने अपना सर्वस्व दिया
वहीं कभी नदिर ने कभी नस्जिद ने
एक दूजे को ख़ाक किया
जिन कंधों ने संगीन उठाई
 उनके साथ ही द्रोह हुआ

हंस कर उसने हर वेदना में
जिनका साथ दिया
उसी देशवासी ने
उससे कैसा घात किया
नेताओं की बपौती
आज उसका देश हुआ
आज  रूपया हर बात में सर्वोपरि हुआ
उसने जाना उसके बलिदान का मूल्य
कितना अब क्षीण हुआ
जिन कंधों ने संगीन उठाई
 उनके साथ ही द्रोह हुआ

मनीषा

है ये देश अपना इस पर गर्व ज़रूरी है





है ये देश अपना इस पर गर्व ज़रूरी है
हो संकट कितना ही गहन पर प्रयास ज़रूरी है
बहुत कुछ काला है यहाँ
माना है बहुत घोटाला यहाँ 
इन अंधेरो में दीप जलाना ज़रूरी है
है ये देश अपना इस पर इतराना ज़रूरी है

आरोप प्रत्यारोप है आम यहां
संसंद में है रोज़ सर्कस यहाँ
इन गलियारों में सच को दोहराना ज़रूरी है
है ये देश अपना इस पर इतराना ज़रूरी है
धर्म के हैं विविध रंग यहाँ
ढोंग का भी लगा नित बाज़ार यहाँ
इंसा का इंसा पर विश्वास ज़रूरी है
है ये देश अपना इस पर इतराना ज़रूरी है

आसमानों सी ऊँची उड़ान यहाँ
बीती सदियोँ का है ज्ञान यहाँ
बल -शक्ति से दुश्मन का दिल दहलाना भी ज़रूरी है
है ये देश अपना इस पर इतराना ज़रूरी है
रंग केसरिया भी शान यहाँ
हरे रंग का भी है मान यहाँ
अपने सब रंग बिसरा,लहराना एक तिरंगा ज़रूरी है
है ये देश अपना इस पर इतराना ज़रूरी है
है ये देश अपना इस पर गर्व ज़रूरी है
हो संकट कितना ही गहन पर प्रयास ज़रूरी है
मनीषा

Monday, August 10, 2015

जिनकी नज़रों से देखी थी दुनिया

जिनकी नज़रों से देखी थी दुनिया कभी 
उन्ही को नज़रे चुराते देखा है 
जिनके कंधे पर रख सर रोया है ज़माना 
उन्ही को आंसू छिपाते देखा है 
जिनके दरवाज़े से ना लौटा था कोई हाथ खाली 
उन्ही से दुनिया को दामन बचाते देखा है 
जिन्होंने झेले है बदलते मौसमों को मुस्कुराते 
हमने तूफानों में उन्ही पुराने दरख्तों को 
लड़खड़ाते देखा है 
मनीषा

Sunday, August 9, 2015

शब्द मेरे, राग यह धरा सुनाती है

शब्द मेरे,  राग यह धरा सुनाती है
हौले हौले मेरे तुम्हारे संग गुनगुनाती है
सुनो, धरती गाती  है

तरुदल की हरियाली में
कभी पुष्प  की लालिमा में
भंवरों की मदमस्त गुंजन संग
पंछियों की सुर ताल में
धीम धीमे मुस्काती है
सुनो धरती गाती है


निर्झर के वैरागी गान में
सरिता  के शांत स्वर में
वादी की हवाओं के संग
मेघों के चपल स्वर में
धीमे  धीमे मुस्काती है
सुनो धरती गाती है


गर्मी की भीष्म उष्मा में
सर्दियों की गहन धुंध में
सावन की पहली बारिश के संग
कभी पतझर के रूठे स्वर में
धीमे  धीमे मुस्काती है
सुनो धरती गाती है

शब्द मेरे,  राग यह धरा सुनाती है
हौले हौले मेरे तुम्हारे संग गुनगुनाती है
सुनो, धरती गाती  है
मनीषा 

Friday, August 7, 2015

मेरी तरह भटक रही है

मेरी तरह भटक रही है आरज़ूऐं  मेरी
जाने किन सितारों तले मिलेंगी राहते मेरी
किस राह से पूछूँ  अपनी मंज़िलों का पता
क़ज़ा में लिखी ना हो 'गर खुदा ने ही पनाहें तेरी
मनीषा 

Wednesday, August 5, 2015

इतना ही सा तो है मेरा घर संसार

दाल चावल रोटी चपाती में
लिपटी मेरी कविता सारी
हल्दी नून और जीरे के छौंक ने
सिखाई मुझे परिभाषा सारी
उबलते दूध ने दिया मुझे दोस्ती का सार
तो पाया परसी थाली में जीवन का सार
चुटकी भर  हींग के तड़के सी पाई मैंने कशिश
कटोरी भर मीठे हलुवे सा मिला सबका प्यार
इतना ही सा तो है मेरा घर संसार
मनीषा

हथेली पर उतरी धूप का एक टुकड़ा

 हथेली पर उतरी धूप का एक टुकड़ा
या है ये बीते लम्हों का एक कतरा
आज में कल थोड़ा थोड़ा समाया हुआ
और कल में आज थोड़ा सा बिसराया हुआ
हथेली पर मेरी सुनहली  मेहँदी सा रच गया
धूप  का ये नन्हा सा कतरा
नभ  के आशीष सा मन में उतर  गया
अकेली सी बैठी थी मैं एक सदी से
मुझ अनजानी  से पहचान कर गया
हंस कर जाने कितनी बाते कर गया

मनीषा  

Sunday, July 26, 2015

जो मेरा है

जो मुझमे है मेरा है
क्या उसे याद करूँ
भूलूँ भी तो कैसे
खुद स्वयं को भी क्या भूला
या याद किया जा सकता है
मनीषा

Wednesday, June 3, 2015

शिकायत तो यही रही

शिकायत तो यही रही हमारे इस अफ़साने में 
हम आँखों से बोलते रहे वो हमारे लफ्ज़ सुनते रहे 
दिल टूटता रहा हर्फ़ दर हर्फ़ लब हमारे हँसते रहे 
वो पढ़ न सके हम कह न सके फासले यूं ही बढ़ते रहे 
मनीषा

Monday, June 1, 2015

टूट के जुड़ने का हुनर उसे आया

टूट के जुड़ने का हुनर उसे आया 
तो उसके काम भी आया बहुत 
हम जो बिखरे तो बस बिखर के ही रह गए 

समेटना ना 
थोड़ा आया  ना आया बहुत 

उसकी याद के लम्हे ज़िंदगी से उधेड़ते 
बैठे रहे 
फ़लसफ़ों में जीने का सलीका ना आया 
न सीखे 
ज़िंदगी के थपेड़ों ने सिखाया तो बहुत 
वो जो बिछड़ा तो नसीब में ना आया फिर 
पीरों में मज़ारों में मन्नतों में दुआओं में 
हमने उसे पुकारा तो बहुत 

खाली कोरे पन्ने ज़िंदगी के 
उसी के नाम से भरे जाते हैं 
वो एक शख़्स जो आज निगाहे 
मिलाने से भी कतराता है बहुत 

मनीषा

Sunday, May 10, 2015

बस एक तू ही नहीं मिलती

सारा जहां मिलता है
मुझसे आज हँस हँस कर
बस एक तू ही नहीं मिलती
प्रशंसा पत्र इनाम तो बहुत मिलते हैं
तेरी प्यार भरी झिड़की नहीं मिलती
सौ पकवान भरे दस्तरख़ान बहुत मिलते हैं
माँ तेरे हाथ की घी चुपड़ी रोटी नहीं मिलती
बहुत नरम बिछौने हैं मेरे इस घर में भी
पर तेरी दुलार भरी गोद  नहीं  मिलती
सोती तो हूँ माँ हर रात अपने इस सुख संसार में
पर जो तेरी लोरी सुन कर आती थी वो नींद नही मिलती
जहाँ भी जाती हूँ इस दुनिया में
घर जल्दी लौट आने की अब हिदायत नहीं मिलती
मनीषा

माँ

वो घर खाली मकां होते हैं
जहां माँ के मान नही होते हैं
मनीषा

एक फूँक से सारी चोट ठीक कर देती है
ईश्वर भी सुनता है
जब माँ आशीष से झोली भर देती है
मनीषा

माँ जब आती थी



जाने कैसे करती थी 
माँ  आती थी तो 
मेरे एक कमरे को घर कर देती थी 
बिस्तर की मैली चादर धो देती थी 
मेरी कुरती  में सितारे जड़  देती थी 
जाने  कैसे करती थी 
जिसमे मुझको बरसों लगते हैं 
हर वो काम माँ  चुटकी में कर देती थी 
सूखी दाल रोटी में अजब स्वाद भर देती थी 
जाने कैसे करती थी 
कितने बड़ी पापड़ गुझिया से वो 
सारे खाली डिब्बे भर देती थी 
पापा से छिपा के मेरे बटुए में 
ढेर से रूपये धर देती थी 
जाने कैसे करती थी 
माँ जब होती थी तो
साँझ को घर जल्दी आने का मन में चाव भर देती थी
घर के द्वार पर हल्दी कुमकुम की थाप कर देती थी
पूजा घर तुलसी में मान भर देती थी
हर दिन को वह त्यौहार  कर देती थी
माँ जब आती थी
तो मेरे घर को मंदिर कर देती थी 
मनीषा 

Monday, May 4, 2015

मुलाकात

 बाद मुद्द्त के फिर उनसे मुलाकात हुई 
जो किसी ने ना समझी ना जानी 
आँखों की आँखों से वो ही बात हुई 
वो मुस्कुरा दी हम हंस दिए 
इश्क की मासूमियतें अब जवान हुई 
मनीषा

Sunday, May 3, 2015

माँ का घर भाभी का आँगन

माँ का घर भाभी का आँगन
सखियों का साथ
वो झूलों की ऊंची ऊंची पींगें
वो रात भर चहकना
वो दिन भर मटकना
वो हमारे नाज़ और नखरे
वो दादी का 'हाय राम! ये लड़की!' वाली घुड़कियाँ
वो गिट्टे वो टप्पे वो माँ की साड़ियाँ
वो चादर ढकी मेज़ के नीचे  वाली दोपहरियां
वो गुड़िया की  शादी  पर सखियों से लड़ाईयां
हम और हमारी कारगुजारियां
वो माँ का चोरी से आँखें दिखाना
वो पापा की आड़ में डांट से बच जाना
वो चाचू की साईकिल पर
पूरी दोपहरिया गली में चक्कर लगाना
वो बुआ का आना
और सारे घर का खिलखिलाना
बहुत याद आता है
बचपन की नटखट गलियों में
हर बार खींच ले जाता है
ये आँगन में लगे
आम के दरख्त पर बौर का आना
मनीषा

Friday, May 1, 2015

अमृता



भीगी माटी से उठा कर 
अक्षरों को कागज़ पर रख दिया 
कविता महक गई 
रचना अमृता हो गई

फूली सरसों के बीच से 
गुज़र कर आई हैं पंक्तियाँ 
और मेरे देश की ज़ुबां हो गई 
तुम अक्षर अक्षर होती रही 
मुल्क बनता रहा बिगड़ता रहा 
दर्द पिरोती साँझ उतरती रही 
तुम स्वयं मसीहा होती रही

कोरे कागज़ पर बिखरे 
एक मुठ्ठी अक्षर 
किरणों को तराशते सूरज 
की खोज में भटकते रहे 
साहिल दर साहिल 
जाने कब तुम दरगाह हो गई 
मनीषा

31 October 2005

दर्द जब हद से गुज़र जाए


आप ही अपनी दवा हो जाए 
ये ज़नाज़ा -ए -आशिक है या रब 
महबूब की गली से जो गुज़र जाए 
तो जान -ए -तरब में बदल जाए 
मनीषा
जान -ए -तरब -life of joy

Monday, April 27, 2015

किस किस पीड़ा को बाँधू शब्दों में

किस किस पीड़ा को बाँधू शब्दों में
किस किस  ज़ख्म पर रख दूँ मलहम
हर आँख से  टपका हर अश्रु
शूल सा चुभता है
शब्दों में सड़ते जिस्मों की सड़ांध भरूँ तो कैसे ?
कितने कफ़न और बुनवा  लाऊँ
सोग मनाने के लिए शहर इकठ्ठा है
इस शहर का हर शख्स बहरा है
सियासत ज़िंदा रहती है लाशों के ढेर पर
कुछ गिद्ध जा बैठे हैं उस प्राचीर पर
शहर के बागीचों में तैर रही सुरा की धार
वहाँ  किसान सूखा खेत तकता है
बच्चों को दे ज़हर जा पेड़ से लटकता है
चीखते रहते हैं रात और दिन
जनतंत्र की चिता दहकती  रहती है
रोज सिर्फ मुद्दों के चेहरे बदल जाते हैं
कहाँ किन कानों  में उगल दूँ
इस छाती का ज़हर
मुर्दों की बस्ती से क्या करूँ उम्मीद
यहाँ इन्साफ महँगा खून सस्ता है
इंसान की कीमत वहाँ क्या होगी
जहाँ ज़मीर कौड़ियों के भाव बिकता  है
जहाँ ज़मीर कौड़ियों के भाव बिकता  है
मनीषा

Saturday, March 28, 2015

लिखना है तो दिल की बात लिखो

लिखना है तो दिल की बात लिखो 
सूनी राहें तकते 
सूखे जो आँसू नम आँखों में 
उसकी याद लिखो 
लिखना है तो उन कांपती हथेलियों की 
सिरहन की बात लिखो
लिखना है तो
रात के सन्नाटों में उठती
हूक की बात लिखो
उन बूढ़ी बातों से झरते
प्यार की बात लिखो
लिखना है तो मन पर जो
अपने जाए ने जो दिए
आघात उसकी बात लिखो
लिखना है तो चोट खाए माँ के दिल से
निकले आशीष की बात लिखो
मनीषा

Friday, March 27, 2015

सदियों से सांझी ये पीर पुरानी है

सदियों से सांझी ये पीर पुरानी है
सखी  तेरी और मेरी एक ही कहानी  है
कुछ अश्रु तेरी आँखों के मेरी आँख में उतर आए
कलम है मेरी पर यह तेरी ज़ुबानी है
सदियों से सांझी यह पीर पुरानी है

मन में विक्षोभ लब पर ख़ामोशी उतारी  है
सखी तूने मैंने जो झेली वही पीर बतानी है
कितने मर्यादा के ज़ेवर पहने रस्में उतारी  हैं
फिर भी दाह  में जलती काया की चीख सुनानी  है
सदियों से सांझी यह पीर पुरानी है

कभी सफेद कभी लाल ओढ़नी में जो दब जाती है
उन  घुटती  सूखी आँखों की तडप आज बतानी है
सौ पर्दों के बीच जो घूरती उन आँखों की लौ बुझानी है
हैवानी पंजो की पकड़ से अपनी लाज छुडानी है
सदियों से सांझी यह पीर पुरानी है

सखी आखिर तो तेरी और मेरी एक ही कहानी है
सदियों से सांझी यह पीर पुरानी है
मनीषा


Wednesday, March 25, 2015

कुछ आँचल के साये

कुछ आँचल के साये इस कदर रूठ जाते हैं 
बात बात पर याद आते हैं 
दिल पूछता है हर लम्हें से 
जाने वाले क्या हमारी सदा सुन पाते हैं 
ऐसे जाते हैं जो क्यों मुँह फेर जाते हैं 
जाने वाली क्यों कभी लौट कर नहीं आ पाते हैं 
कहते हैं वो आसमां के तारों में मुस्काते हैं 
उनकी याद में जब हम अश्रु बहाते हैं 
हमसे मिलने के लिए शायद वो भी छटपटाते हैं
और जब भी उन्हें याद कर हम मुस्काते हैं 
धरा की हर शह में वो हमारे संग गुनगुनाते हैं 
मनीषा

Monday, March 23, 2015

दुनिया का दस्तूर

दुनिया का दस्तूर निभाना पड़ता है 
ना चाहते हुए भी मुस्कुराना पड़ता है 
आँख में छलके आँसू को छिपाना पड़ता है 
हो मन में घोर संताप जीवन में हो कोई विषाद 
फिर भी है सब ठीक बताना पड़ता है 
दुनिया का दस्तूर निभाना पड़ता है
मनीषा

Tuesday, March 10, 2015

तेरे भीतर जो खामोश बैठा करता है

तेरे भीतर जो खामोश बैठा करता है
वो शख्स जो सब देख कर
सह कर भी
चुप रहा करता है
उस शख़्स  के वजूद को
आवाज़ दे और बुला ले
थोड़ी खामोशियाँ बाँटनी  है
उस से
मनीषा 

Sunday, March 8, 2015

कहां है किसी भी संस्कृति में मेरा स्थान

सच कहते हो
हाँ सच ही तो कहते हो
कहाँ है भारत की इस महान संस्कृति में
स्त्री का स्थान
कभी गढ़ दी गई देवी कह पत्थर की प्रतिमा में
कभी सीता बन कर भूमि में समाने को हो गई विवश
द्रौपदी का चीर , सीता का हरण
पौरूष की व्याख्या से ढक देते हो
और कितनी अग्नि परीक्षाएँ लेते हो
सच कहते हो
हाँ सच ही तो कहते हो
कहां है किसी भी संस्कृति में मेरा स्थान
सर से ले कर पाँव तक
सब श्रृंगार तुम्हारे नाम के जड़ देते हो
एक चुटकी सिन्दूर से
अस्तित्व की पहचान बदल देते हो
मेरे सब नाम बदल देते हो
जहां जन्मती हूँ उस आँगन को पराया कहते हो
जहाँ डोली से उतरती हूँ उस घर को अपना ही कहते हो
सच कहते हो
हाँ सच ही तो कहते हो
कहां है किसी भी संस्कृति में मेरा स्थान
सारे घर में सबका कमरा होता है
कोई बताए माँ का कमरा कौन सा होता है
माँ रहती है चौके से पूजा घर तक सीमित
खाना बनाना , घर सम्भालना उसी का दायित्व होता है
ऑफिस से घर तक सिर्फ दायित्व सुना देते हो
बहुत एहसान है जो प्रसव के बाद छः माह छुट्टी दे देते हो
सच कहते हो
हाँ सच ही तो कहते हो
कहां है किसी भी संस्कृति में मेरा स्थान
बस में मेट्रो में दो सीट सुरक्षित कर देते हो
दस डब्बों में एक अलग कर देते हो
बाहर निकलने का समय तय कर देते हो
और क्या पहनूँ तुम तो बुर्के में भी नंगा कर देते हो
उम्र मेरी चाहे हो दो या अस्सी तुम तो
मुझे सिर्फ योनि तक सीमित कर देते हो
सच कहते हो
हाँ सच ही तो कहते हो
कहां है किसी भी संस्कृति में मेरा स्थान
मैं अबला हूँ इसका अर्थ एक पंक्ति से बदल देते हो
क्या खाऊँ क्या खरीदूँ कितना पढ़ूँ कहाँ जाऊँ
किस से मिलूँ कब हँसू कितना बोलूँ
किसके संग जीवन बिताऊँ
तुम तो सब आयाम निश्चित कर देते हो
आँख खुलने से आँख बंद होने तक
अपने अहम में मेरी जुबां खामोश कर देते हो `
गार्गी, अपाला, घोषा, लोपामुद्रा के उदाहरण भुला दिए
रूपकुँवर की स्मृति में मंदिर बना जिन्होंने करोड़ों कमाए
जिस देश में इन्दिरा जैसी बेटी राज कर जाए फिर भी
कल्पना चावला सिर्फ एक अपवाद कहलाए
प्यार के नाम पर किसी लक्ष्मी पर कोई एसिड उड़ेल जाए
साल भर की बिटिया भी दामिनी की तरह तड़प तड़प मर जाए
उस संस्कृति में सच ही कहते ही
हाँ सच ही तो कहते हो
कहाँ है वहां स्त्री का स्थान
सच कहते हो
हाँ सच ही तो कहते हो
कहां है किसी भी संस्कृति में मेरा स्थान
मनीषा

Thursday, March 5, 2015

सपनों में सच का रंग मत घोलो

सपनों  में सच का रंग मत घोलो
तुम मेरे संग होली खेलो
मैं बिसराऊँ खुद को
तुम मुझमे खुद को भूलो
तुम मेरे संग होली खेलो

बन जाओ तुम अंबर
मैं धरा सी बिछ जाऊं
बिखेरे सुदूर क्षितिज पर
साँझ सुबह के रंग दोनों
तुम मेरे संग होली खेलो

बन जाना तुम कान्हा
मैं राधा हो जाऊं
हो वृन्दावन ये जग सारा
इस फाल्गुनी हवा में मस्ती घोलो
तुम मेरे संग होली खेलो

सपनों  में सच का रंग मत घोलो
तुम मेरे संग होली खेलो
मनीषा 

Tuesday, February 17, 2015

तुमसे मेरा नाता क्या

तुमसे मेरा नाता क्या
तुम पर मेरा अधिकार क्या

मन की पीड़ा को
तिनके सा आराम मिला
तेरे द्वारे आ पल भर को
तपती धूप से विश्राम मिला
मन का मन से ये नाता क्या

तुमसे मेरा नाता क्या
तुम पर मेरा अधिकार क्या

तेरी एक मुस्कान ने
जाने कितने इन आँखों के अश्रु धोए
तेरी मीठी बातों ने
जाने कितने मन पर मेरे हास बोए
शब्दों का शब्दों से ये रिश्ता क्या

तुमसे मेरा नाता क्या
तुम पर मेरा अधिकार क्या

कृतार्थ तुम्हारी तुमने जो
मेरे पग से कंटक बीने
साथी बन तुम जो
दो पग साथ चले
जन्मों  का जन्मो से वादा क्या

तुमसे मेरा नाता क्या
तुम पर मेरा अधिकार क्या
मनीषा 

Monday, February 2, 2015

इन आँखों ने

इन आँखों ने मंज़र तमाम देखे हैं

जाने कितने सुबह औ' शाम देखे हैं
रिश्तों के बदलते आयाम देखें हैं
जाने कितने जलते बुझते चिराग देखें हैं

इन आँखों ने मंज़र तमाम देखे हैं

तेरी आँखों में जो उतर आए थे
वो  सावन कई  बार  देखें हैं
जाने कितने सवाल बेज़ुबान देखें हैं

रस्मों रिवाज़ों में दम तोड़ते
अरमान हज़ार देखें हैं
दुनियावी आँखों में तंज हज़ार देखें हैं

इन आँखों ने मंज़र तमाम देखे हैं


मासूम कलियों के
मज़ार बेशुमार  देखें हैं
मोहब्बतों के इम्तिहान हज़ार देखें हैं
'
इन आँखों ने मंज़र तमाम देखे हैं

नफरतों के कारोबार
बदस्तूर चलते तमाम देखें हैं
जिस्मानी भूख के बाज़ार हज़ार देखें हैं

इन आँखों ने मंज़र तमाम देखे हैं

और क्या बाकी रहा है यहां  अब
देखने दिखाने  को ऐ  खुदा
तेरे इंसान की शक़्ल में  हैवान हज़ार देखें हैं

इन आँखों ने मंज़र तमाम देखे हैं
मनीषा 

Sunday, February 1, 2015

सप्तपदी के वो सात पग

हम मिलते हैं
सही गलत की सरहद के उस पार
जहां पाप और पुण्य एक हो जाते हैं
सभी परिधियों  नीतियों के उस पार
जहाँ  भेद विभेद मिट जाते हैं
बस तुम और मैं
स्वयं में गुम
कर्ता  और कर्म से परे
कुंडलियों और सितारों के उस पार
और चलते हैं सृष्टि के साक्ष्य में
सप्तपदी के वो सात पग
और मिट जाता  है फिर
 तुम और मैं का यह फर्क....
मनीषा 

कहते तो हो जाओ

कहते हो कि  जाओ , मैं तो चली ही जाऊँगी
तेरी तन्हाईंयों  में कसक  छोड़ जाऊँगी
तेरे मन पर अपनी बातों का असर छोड़ जाऊँगी
कहते तो हो जाओ
और मैं तो चली ही जाऊँगी
तेरे सीने में इक खलिश छोड़ जाऊँगी
तेरे बदन में अपनी सांसो की महक छोड़ जाऊँगी
कहते तो हो जाओ
और मैं तो चली ही जाऊँगी
तेरी महफ़िलों  में इंतज़ार छोड़ जाऊँगी
तेरी नज़र में अपनी मुस्कान छोड़ जाऊँगी
कहते तो हो जाओ
और मैं तो चली ही जाऊँगी
तेरी हथेलियों में अपना नाम छोड़ जाऊँगी
तेरी आवाज़ में अपनी पुकार छोड़ जाऊँगी
कहते तो हो जाओ
और मैं तो चली ही जाऊँगी
तेरी बाँहों में अपनी 'जान' छोड़ जाऊँगी
मनीषा